मंगलवार, 15 अगस्त 2017

और मैं स्वतंत्रता दिवस भूल गया

मैं सुबह की मीठी नींद सो रहा था कि किसी भारी-भरकम आवाज का कानों में प्रवेश हुआ। और मैं स्वप्न लोक से इहलोक में आ गया। आंख खोलकर देखा तो मेरे सात जन्मों की संगनी भृकुटी चढ़ाये खड़ी है। मुझे अलसाते देख यथाशक्ति कोमल स्वर में बोली-‘आपकेा आपिफस नहीं जाना है?’ ‘हां! जाना है पर इतनी सुबह क्यों जगा रही हो।’ मैंने स्पष्टीकरण मांगा जो वाकई मुझे कभी नही मिला। ‘सारी जिन्दगी सोते ही रहियेगाा। आज 15 अगस्त है, आपिफस नहीं पहुंचना है?’ झुंझलाते हुये वह बोली और किसी जलजले की भांति कमरे से बाहर चली गयी। पर मुझे जोर का झटका जोर से लगा कि अरे! मैं 15 अगस्त! मैं ‘स्वतंत्रता दिवस’ कैसे भूल गया!
 मैं उध्ेड़बुन में फंस गया। मैं स्ववंत्राता दिवस क्योंकर भूल गया। यह कैसे हुआ? मैंने बचपन से लेकर अभी तक पूरे मनोयोग से मनाता आ रहा हूं। एक बार भी नहीं भूला, आज क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ? ऐसी ध्ृष्टता कैसे हुई मुझसे। यह तो कृतग्घनता हुई देश से। ऐसे कितने विचारों का आवेग मुझ पर बढने लगा। कि मेरी आंखों के आगे अंध्ेरा छाने लगा और जन गण मन का राग चारों दिशाओं में गूंजने लगा। और तत्काल मैं पफ्लैस बैक में चला गया और इस भयानक भूल का कारण तलाशने लगा।
मैं अपनी स्मृति-मशीन के द्वारा अपने पिछले सभी स्वतंत्राता दिवसों घूम रहा था। मैं बचपन में लड्डुओं के लालच में 15 अगस्त को स्कूल अवश्य जाता था। इस दिन मेरे पेट में कभी दर्द नहीं होता था। वहां होने वाले सारे कार्यक्रमों पूरे मनोयोग से देखता था जो मुझे भारस्वरूप भले ही लगते थे। पर मेरा सारा ध्यान मोदकों पर टिका रहता कि कब वह मेरे हाथ लगे और मैं घर पहुंचू। लेकिन ऐसा कापफी इंतजार के बाद सम्भव होता था। बचपन में 15 अगस्त के दिन मास्टर जी एक बात अवश्य बताते- बच्चों! हम सब 15 अगस्त को स्वतंत्रा हुये थे और इसी दिन हमें स्वतंत्रारूप से जीने का अध्किार मिला था।’ इस बात का प्रभाव किशोरावस्था तक आते-आते मेरे मन-मस्तिष्क में जबरदस्त पड़ गया कि मैं 15 अगस्त 1947 के बाद पूर्ण रूप से स्वतंत्रा हो चुका हूं। इस अवस्था में इस अध्किार को प्रयोग करने के लिये मैं हमेशा लालायित हो उठता था। लेकिन मेरी इस सोच पर तब तुषारापात हो जाता जब मैं पढ़ना नहीं चाहता और खेलने की स्वतंत्राता मांगता, दोस्तों के साथ घूमने, पफैशनेबल कपड़े पहनने एवं सिनेमा जाने की स्वतंत्राता मांगता तब पिताजी मुझे लम्बा-चैड़ा भाषण देते ओर बताते कि कितनी मेहनत के बाद वह अध्यापक बन पाये है अगर तुम्हारे यही लक्षण रहे तो तुम स्कूल का चपरासी भी नहीं बन पाओगे, समझे! और इसके बाद मेरी हर प्रकार की स्वतंत्राता पर प्रतिबंध् लग जाता। खैर, इन सब के बावजूद मैं 15 अगस्त जोरशोर से मनाता रहता। इस समय तक मैं एक चलता पुर्जा किस्म का छात्रा बन गया था। अपने जैसे विचारों वाले छोटे भाई लोगो का एक ग्रुप बना कर छुटभैरूया नेताओं की चमचागिरी कर लेता था। उन्ही के प्रोत्साहन से थोड़ी बहुत भाषणबाजी भी करने लगा था। पढ़ाई-लिखाई में तो मुझे कभी तारीपफ मिली नहीं इसलिये साल में मिलने वाले ऐसेे एक दो मौको को मैं नही छोड़ता था। और स्वतंत्राता दिवस खूब मनाता।
युवावस्था में मुझे एक सीध्ी-साध्ी लड़की से प्यार हो गया। तब स्वतंत्राता वाली मेरी भावनायें पिफर से जाग्रत हो गई।  कि प्यार करने और अपनी पसंद की लड़की से विवाह करने के लिये तो मैं स्वतंत्रा हूं। लेकिन यहां भी मैं गलत हो गया। पिता जी को मेरा प्यार पसंद नहीं आया और जल्द ही उन्होंने एक सुयोग्य-गृहकार्य दक्ष गृहलक्ष्मी से मेरी सगाई कर चैन की सांस ली। पिफर भी मैं स्वतंत्राता दिवस मनाता रहा। शादी होने के बाद गृहस्थी की गाड़ी हांकनी थी इसलिये जोड़-तोड़कर के सरकारी आॅपिफस में क्लर्की हासिल कर ली। सोचा कि यहां पर सात-आठ घंटे रहकर अपनी स्वतंत्राता का प्रयोग कर सकूगा। पर अपफसोस! अध्किारियों के आदेश पर फाइलो को इध्र-उध्र करता रहता। उपर-नीचे भी करता। कभी इसको टालता, कभी उसको टालता। उफपर से जैसे आदेश मिलते मैं वैसा ही करता। कभी स्वतंत्रा क्लर्की नहीं करता, पर हर साल मैं 15 अगस्त अवश्य मनाता। जिंदगी इन्ही स्वतंत्राओं के अपहरणों के बीच चलती रही और मैं स्वतंत्राता दिवसों को पूरे ;बुझेद्ध मन से मनाता रहा। आज भी स्वतंत्राता दिवस है मैं तैयार होकर जा रहा हूं। स्कूली पोशाक में सजे-ध्जे बच्चे तिरंगा लिये भागते चले जा रहे। तभी मुझे किसी की जोर से पुकारने की आवाज सुनाई दी। मैंने देखा कि मैं अभी भी बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं मेरी पत्नी मेरे सामने खड़ी मेरी चादर खींचते हुये कह रही है‘ऐसे ही जिंदगी भर उघांते रहना, जाइये, जल्दी से निपटाकर आइये। दूसरे भी काम करने है। बड़ी मुश्किल से कोई छुट्टी का दिन मिलता है।’



रविवार, 18 दिसंबर 2016

हम सब का चैन!

आधी रात के बाद!
वह बूढ़ा चौकीदार
डंडा टेकता हुआ
ठक ठक ठक ठक
सीटी बजाता हुआ,
रात की रखवाली करता है
चोरों से,
कि वे चुरा न ले जाए
रात की कालिमा
रात की नीरवता,
उसकी ख़ामोशी
और हम सब का चैन!!

बुधवार, 14 सितंबर 2016

डिजिटल वर्ल्ड की न्यू 'वुमनिया'


एक समय जानीमानी साहित्कार एवं महिला मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी करने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने कहा था कि आज गांव-देहात में मोबाइल ने स्त्रियों को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। लेखिका का यह कहना बिलकुल वैसे ही है जैसे कभी यूरोपियन देषों में महिला अधिकारों के समर्थकों ने कहा था कि गर्भनिरोधक उपायों ने महिलाओं को कहीं अधिक स्वतंत्र और सक्षम बनाया है। कुछ ऐसा ही तब कहा गया जब हमारे घरों की रसोई में प्रेषर कुकर और गैस-स्टोव ने दस्तक दी। इन बातों से यह पता चलता है कि टेक्नॉलजी ने स्त्रियों के जीवन में ऐसे परिवर्तन किये जिसे हमारे तथाकथित धर्म षास्त्र और तमाम कानून भी एक साथ मिलकर नहीं कर पाए। महिलाओं के हाथों में छह इंची मोबाइल ऐसा हथियार है जिसके सहारे न केवल वे आज अपने सपनों की उड़ान भर रही हैं बल्कि इस मेल डॉमिनेटिंग सोसायटी में अपना एक मुकाम और कोना तलाष रही है।
आजकल एक महिलाओं को लेकर एक नई षब्दावली चल पड़ी है ‘डिजीटल वूमन।’ यानी ऐसी महिलाएं जो खूब नेट सैवी हो और सर्फिंग में रुचि लेती हां। अगर आंकड़ों की भाषा में बात करे तो पुरुषों के मुकाबले 49 फीसदी महिलाएं आज देष में इंटरनेट यूज करती हैं। यानी आधी आबादी का एक लगभग पूरा भाग इंटरनेट का लाभ ले रहा है। इंटरनेट में उनकी उपस्थिति का यही कारण है कि सोषल मीडिया में भी महिलाएं अपनी हिस्सेदारी दिखा रही हैं। चाहे वह सबसे लोकप्रिय सोषल साइट फेसबुक हो या वाट्स-एप, सभी जगह वे अपनी मुखर आवाज के साथ उपस्थित है। ट्वीटर, गूगल प्लस, लिंकलिड्स, ब्लॉग, यू-ट्यूब ये कुछ ऐसी जगहें हैं जहां पर महिलाएं बेखौफ आकर अपने रूटीन लाइफ को आसान करती हैं और बेबाकी से अपने विचार षेयर करती हैं। आज सोषल साइट्स केवल मेट्रो सिटीज या हाई प्रोफाइल महिलाओं के जीवन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यहां पर आम घरेलू महिलाएं बडे़ षिद्दत से आती हैं। हम एक ओर तो वाट्सएप पर अपने पड़ोस की अांटी को किटी पार्टी मैनेज करते हुए देख सकते है, वहीं तेजतर्रार और सफल महिलाओं को देष-दुनिया के तमाम मुद्दों पर बहस में भाग लेते भी देख सकते हैं। ऐसी तमाम महिलाओं की उपस्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि माइक्रो ब्लॉगिंग ट्वीटर पर प्रसिद्ध उद्योपति किरण मजूमदार षॉ काफी सक्रीय हैं, वहीं लोगों का विरोध झेलने वाली पत्रकार एवं टिप्पणीकार सागरिका घोष भी हैं। बोलने के मामले में हद तक बदनाम महिलाएं अपने आपको इस मीडियम के माध्यम से अभिव्यक्त करना चाहती है और इसको आसान किया है डिजिटल टेक्नॉलजी ने। यह देखना बहुत ही दिलचस्प है कि कैसे यह छोटा सा गैजेट वूमेन लाइफ को बदलकर रख दे रहा है। यह क्या कम है कि यह डिजिटल वर्ल्ड महिलाओं के छोटे-मोटे काम ही आसान नहीं कर रहा है बल्कि उनकी सुरक्षा को भी सुनिष्चित कर रहा है।

कुछ सालों से इंटरनेट उपयोग करने वाली कुछ महिलाओं से जब बात की गई तो उन्होंने समानरूप से एक बात कबूल की कि इंटरनेट, सोषल साइट ने उनके जीवन को बदल दिया है। वे पहले से ज्यादा सोषल व एक्टिव हो गई हैं। षादी के बाद जब उन्हें लगता था कि अब स्वयं के लिए कुछ कर पाना न-मुमकिन सा हो गया है या खुद के लिए जिंदगी समाप्त सी हो गई है तब इस डिजिटल वर्ल्ड ने उनके लिए सारा संसार दिखा दिया। इस डिजिटल वर्ल्ड ने उनके लिए जीवन के कुछ नए दरवाजे खोल दिए। इससे वे ऐसी दुनिया के करीब आई हैं जो उनके लिए ‘प्रोहिवेटेड’ थी, लगभग बंद थी। आज सोषल साइट के जरिए देष के उत्तर में रहने वाली एक स्त्री दक्षिण की दूसरी या विदेष में रहने वाली महिलाएं देष की दूसरी महिलाओं के संपर्क में आसानी से आ गई है। जहां वे दिल खोलकर बोल और बतिया रही हैं। यहां पर वे अपने और उनके कष्टों और कठिनाइयों को षिद्दत से सुन और महसूस कर पा रही हैं। महिलाओं के लिए इंटरनेट केवल मनोरंजन या एंटरटेन का साधन मात्र नहीं है बल्कि इंटरनेट का यह कोना ‘ओ वुमनिया’ टाइप का है जो केवल उनके लिए ही है उनके जैसा ही है।    

शनिवार, 18 जून 2016

बुंदेलखंड सूखा : मतलब अकाल, मतलब भूख, मतलब मौत

’इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ।
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ।।
हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे।
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे।।‘
लातूर, विधर्भ की सूखे की खबरों और कवि-अभिनेता पियूष मिश्रा की इन पंक्तियांे का सबब सोचने समझने से पहले बुंदेलखंड के एक जिला महोबा से एक खबर के निहितार्थ जानने चाहिए। यहां से यह खबर आती है ‘रोटी बैंक’ चलाने की। इस बैंक के संचालक कर्ताधरता तारा पाटकर हैं जिन्हें यहां के लोगों की भूख खींच लाई। आष्चर्य है कि बैंकों की स्थापना का सिद्धांत ‘संसाधन का अतिरेक’ होता है वहीं इस ‘रोटी बैंक’ की स्थापना इसलिए की जा रही है कि लोग भूख से मर रहे हैं अर्थात रोटी की कमी है। इस रोटी बैंक से गरीब, बुजुर्गों और भिखारियों को रोटी दी जा रही है। पिछले एक साल से तारा पाटकर इस इलाके में भूख से होने वाली मौतों को मात दे रहे हैं। वजह, सूखा जो अकाल ही भूख का रूप लेकर समस्त बुंदेलखंड को सुनसान बनाने को आतुर है। भूख के लिए लोगों को खून और अपने बच्चें न बेचने पड़े और घास की रोटियां न खानी पड़े, इसके लिए समस्त बुंदेलखंड के लिए तारा पाटकर की यह पहल बहुत ही छोटी है पर यह रोज होने वाली सरकारी पैकेजनुमा घोषणाओं से बड़ी है।
पिछले साल नवंबर में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी योगेन्द्र यादव ने अपने स्वराज अभियान के जरिए ‘‘बुंदेलखंड ड्राॅट इम्पैक्ट असेसमेंट सर्वे’’ किया। यह सर्वे 27 तहसीलों के 108 गांवों में किया गया। इस सर्वे में सबसे गरीब 399 सहित कुल 1206 गरीब परिवारों को षामिल किया गया। सर्वेक्षण के सबसे चिंताजनक संकेत भुखमरी और कुपोषण से सम्बधित है। पिछले एक महीने के खान-पान के बारे में पूछने पर पता लगा कि एक औसत परिवार को महीने में सिर्फ 13 दिन सब्जी खाने को मिली, परिवार में बच्चों या बड़ों को दूध सिर्फ 6 दिन नसीब हुआ और दाल सिर्फ 4 दिन। गरीब परिवारों में आधे से ज्यादा ने पूरे महीने में एक बार भी दाल नहीं खायी थी और 69 प्रतिषत ने दूध नहीं पिया था। गरीब परिवारों में 19 प्रतिषत को पिछले माह कम से कम एक दिन भूखा सोना पड़ा।  
सर्वे से उभर के आया कि कुपोषण और भुखमरी की यह स्थिति पिछले 8 महीनों में रबी की फसल खराब होने से बिगड़ी है। सिर्फ गरीब ही नहीं, लगभग सभी सामान्य परिवारों में भी दाल और दूध का उपयोग घट गया है। यहाँ के 79 प्रतिषत परिवारों ने पिछले कुछ महीनों में कभी ना कभी रोटी या चावल को सिर्फ नमक या चटनी के साथ खाने को मजबूर हुए हैं। 17 प्रतिषत परिवारों ने घास की रोटी (फिकारा) खाने की बात कबूली। सर्वे के 108 में से 41 गावों में इस दौरान भुखमरी या कुपोषण की वजह से मौत की खबरें भी आई। इस सर्वे में आसन्न संकट के कई और प्रमाण भी सामने आये। एक तिहाई से अधिक परिवारों को खाना मांगना पड़ा, 22 प्रतिषत बच्चों को स्कूल से वापिस लेना पड़ा, 27 प्रतिषत को जमीन और 24 प्रतिषत को जेवर बेचने या गिरवी रखने पड़े हैं। मनुष्यों पर आश्रित जानवरों की तो और भी अधिक दुर्गति हो रही है। बुंदेलखंड में दुधारू जानवरों को छोड़ने की ‘अन्ना’ प्रथा में अचानक बढोत्तरी देखी गई है। 
बुंदेलखंड में कुल 13 जिले हैं जिनमें से 7 उत्तर प्रदेश में आते हैं जबकि 6 मध्यप्रदेश में आते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड की कुल आबादी 1 करोड़ 80 लाख है। जिसमें से करीब 79 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और इनमें एक तिहाई से ज्यादा घर ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं। बुंदेलखंड का इतिहास बताता  है कि 19वीं से 20वीं सदी के दौरान 12 बार सूखा और अकाल झेले चुका हैं बुंदेलखंड। सामान्यरूप से हर 16-17 साल में यहां सूखा पड़ा रहा। स्वराज अभियान ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि बुन्देलखण्ड के सबसे गरीब परिवारों के लिए भुखमरी की नौबत आ सकती है। इस क्षेत्र में लगातार तीसरे साल सूखा पड़ा है। साथ ही इस साल ओलावृष्टि, अतिवृष्टि से रबी की फसल भी नष्ट हो गयी थी। बुंदेलखंड इलाके के 60 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को विवश हैं। अधिकांशतः यहाँ  सीमांत कृषक ही है। 25 फीसदी किसान एक से दो हेक्टेयर भूमि पर अपना और परिवार का गुजर-बसर करते हैं। जब खेती और जिंदगी पर कोई संकट आता है तो लिया गया कर्ज ही इनकी जान का जान का दुश्मन बन जाता है। जिसके आंकडे़ बहुत ही भयावह है। 2015 जिसके चलते यहां के 3223 किसान 2009 से 2014 के बीच आत्म ह्त्या कके अपुष्ट आकड़ों के अनुसार 440 किसान या कृषि से अपनी जीविका चलाने वाले अपना सुकून मौत में ढूढ रहे हेैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2009 में 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745 और 2014 में 58 किसानो ने आत्महत्या की।
पिछले कुछ वर्षो में बुंदेलखंड मानसून अनियमित सा हो गया। कभी वर्षा तो कभी वर्षा की कमी, यह स्थिति निरंतर चल रही है। उस पर ओला और पाला की मार , तालाबों, बांधों और कुओं का सूख जाना, ऐसे कुछ कारण हैं जिसनेे यहां की खेती को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। फलस्वरूप खेती पर निर्भर 80 फीसदी आबादी के सामने अब भुखमरी के हालात उत्पन्न हो गए। इसलिए इन इलाकों से पलायन को वजह मिल गई है। प्रवास संस्था की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, एक दशक में करीब 62 लाख लोग बुंदेलखंड छोड़ कर जा चुके हैं। काम की तलाश में किसान मजदूर बनकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मजदूरी के लिए विवष हैं। पल्स पोलियो अभियान के दौरान एकत्रित हुए आंकड़ों और बाद में गायब हुए परिवारों की स्थिति को इस संस्था ने आधार बनाया। जिससे यह भयावह सत्य पता चलता है। बुंदेलखंड का शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां घरों में ताला न लटका हो। 
ज्यों ज्यों आसमान का पारा चढ रहा है त्यों त्यों फौरी राहत की घोषणा हो रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुंदेलखंड सहित सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के लिए कल 867.87 करोड़ रूपए मंजूर करने के बाद बुंदेलखंड के सातों जिलों में पेयजल समस्या से निपटने के लिए इंडिया मार्क-2 के 666 और हैंडपंप लगाने का निर्देश दिया। हैंडपंप की लागत राशि भी 18.42 करोड़ रूपए से बढाकर 21.57 करोड़ रूपए कर दी गई है। लेकिन सरकार को यह समझने दिक्कत क्यों है कि जब जमीन में पानी ही नहीं है तो हैंडपंप पानी कैसे दे सकता है? जलपुरूष कहें जाने वाले राजेंद्र सिंह बुंदेलखंड की इस समस्या का हल नदियों के पुर्नजीवन में ढूढ रहे हैं। नदियों का जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है, इस समय जमीन की तीसरी सतह का पानी निकाला जा रहा है, जिससे धरती का पेट खाली हो रहा है। अगर इस जमीन के खाली पेट को भरा नहीं किया गया तो यहां के लोगों को पीने का पानी कभी नहीं मिल पाएगा। जमीन का खाली पेट भरना और आदमी का खाली पेट भरने में एक अन्योन्याश्रित संबंध है जिसको जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा।
(आंशिक रूप से 'शुकलपक्ष' पत्रिका मई अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 1 जून 2016

शादी सात जन्मों का बंधन है!

‘विवाह एक पवित्र संस्कार है।’ ‘षादी सात जन्मों का बंधन है।’ ‘जोड़ियां ऊपर से बन कर आती हैं।’ ‘पति-पत्नी का रिष्ता एक पवित्र बंधन है’...आदि, इत्यादि। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो हमारे अंदर सदियों से पैंबस्त की गई हैं। और समाज इसी बने बनाएं मूल्यों पर चल रहा है। जब कोई बात इस मूल्य रूपी ढांचे को तोड़ता नजर आता है तो हम बड़े आराम से षुर्तुगमुर्गी रवैया अख्तियार कर लेते हैं और तत्काल उस समस्या या बुराई से ही इंकार कर देते हैं। यह हमारे समाज के दोहरे रवैये को दर्षाता है। जोकि हमारे लिए कहीं अधिक घातक है।
ऐसा ही कुछ रवैया हम ‘मैरिटल रेप’ या वैवाहिक बलात्कार को लेकर दिखा रहे हैं। संयुक्त राश्ट्र की संस्था यूनीसेफ कहती है कि भारत में 15-19 साल की उम्रवाली 34 फीसदी विवाहित लड़कियां को अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलनी पड़ती है। 77 फीसदी पत्नियां कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा जबरदस्ती यौन संबंध बनाने को मजबूर की जाती हैं। इसलिए यूनीसेफ ने सलाह दी थी कि भारत में मैरिटल रेप को क्रिमिनल आफेंस में षामिल कर लेना चाहिए। लेकिन दो साल पहले दी गई इस सलाह को हमारे यहां दूसरी तरह की बहस का मुद्दा बना दिया गया। यहां तक कहा जा रहा है कि इस तरह का कोई भी कानून हमारी वैवाहिक संस्था के लिए घातक होगा और फलस्वरूप सदियों से चली आ रही पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। जो कि बहुत ही अतिपूर्ण नजरिया है।

हमारे समाज मे सेक्स इतना टैबू है कि इसको लेकर कोई बात नहीं जा सकती है चाहे वह एक सामाजिक बुराई का ही रूप क्यों न ले लें। अगर हम इस बात को ही मानने के लिए तैयार नहीं है कि बलात्कार की ज्यादातर घटनाएं घर की चाहरदीवारी में होती है और रेप की इन घटनाओं में से 09-15 फीसदी वैवाहिक बलात्कार के मामले होते हैं। तो आगे की चीजों को हम किस प्रकार तबज्जो देगें? हाल ही में इस मामले में इंदिरा जयसिंह द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट में मैरिटल रेप के अपराधीकरण की सिफारिश की है। इतना ही नहीं निर्भया केस के बाद बनी जस्टिस वर्मा आयोग द्वारा मैरिटल रेप को अपराधों की श्रेणी में शामिल किए जाने की सिफारिश की जा चुकी है। बावजूद इसके हम या हमारी सरकार इस मामले को ‘पवित्र बंधन’ से अधिक मानने को तैयार नहीं दिख रही है। जबकि अमेरिका में 1993 में ही मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में षामिल कर लिया गया था।
मैरिटल रेप को अपराध न समझने को लेकर इतना ऊहापोह सरकार क्यों दिखा रही है। एक महिला के साथ जब रेप होता है तो उसका प्रभाव उम्र भर उस महिला के साथ रहता हैं। वह जिंदगी भर उस हादसे को नहीं भूल सकती। फिर घर के अंदर बेडरूम में वह यह सब झेलती है तो उसका असर उस पर इतना कम करके क्यों आका जा रहा है? केवल इसलिए कि वह अपराध कोई और नहीं बल्कि उसका पति परमेष्वर कर रहा है? यह और कुछ नहीं बल्कि हमारी स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता को ही दिखाता है। यह सब उसी समाज में सही ठहराया जा सकता है जहां स्त्रियों को दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता है। स्त्रियों के प्रति अगर हमारी संवेदनषीलता जरा भी है तो इस मुद्दे पर सोचने के लिए हम मजबूर हो जाएंगे।
मैरिटल रेप मुद्दे पर जब पुरुशों की राय ली जाती है तो उनका वही घिसा-पिटा जवाब होता है कि ऐसे तो हर घर का पति जेल में ही होगा या फिर कानून का मिस-यूज खूब किया जाएगा। कुछ पतियों का यह भी मानना है कि षादी की ही किसलिए जाती है? कहने का अर्थ है कि पति रूपी पुरुष यह बात मानने के लिए कतई तैयार ही नहीं है कि षादी जैसी  पवित्र संस्था में ‘रेप’ जैसा भी कुछ होता है। यह बिलकुल वैसा ही है जब घरेलू हिंसा को लेकर कानून बनाया गया था तब भी लोगों के तर्क इसी तरह के थे कि यह कानून परिवार को तोड़ने का काम करेगा। भला पति यदि अपनी पत्नी को मारता-पीटता या बदजुबानी करता है तो इसमें किसी बाहरी व्यक्ति को क्यूं हस्ताक्षेप करना चाहिए? यह हमारा अपना घरेलू मामला है। पर अंततः जब सरकार ने अपनी संवेदनषीलता दिखाई और घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 बनाया तब हकीकत सबके सामने आ पाई।
कुछ समय में ही मैरिटल रेप एक बहस का मुद्दा बन गया है और बड़े रूढ़िवादी इसके अपराधीकरण किये जाने को विवाह संस्था के लिए खतरा बता रहे है। साथ ही साथ लॉ कमीशन भी इस मामले में अल्पज्ञता दिखा रहा है। विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट ने ‘वैवाहिक रिश्ते के साथ अत्यधिक हस्तक्षेप’ बताकर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इन सबके बीच यह प्रष्न उठता है कि षादी नामक संस्था का भार क्या सिर्फ नारी को ही उठाना पड़ता है? यदि वह अपने बारे में एक प्राणी मात्र होने के कारण सोचती है तो उसे अपराध बोध का भय क्यों लगा रहता है? जिसके कारण उसे मानसिक और षारीरिक रूप से इतना संघर्ष करना पड़ता है जिसका परिणाम अंततः उसे अपनी जिंदगी दे कर चुकाना पड़ जाता है। इससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में भी ‘शादी की पवित्रता’ और गरीबी, अषिक्षा के नाम पर पतियों द्वारा किया जाने वाला बलात्कार परिवार संस्था को बनाए रखने के लिए ‘वैध’ ही बना रहेगा!

( 'मेरी सजनी' के जून अंक में प्रकाशित )

रविवार, 17 जनवरी 2016

अब इतना पढ़ गई हो तो...!

 न जाने कब सफर उबाऊ बन जाए, उससे पहले  कोई पुस्तक या पत्रिका हाथ में ले लेनी चाहिए। इसलिए सफर के दौरान मैं पढने के लिए कुछ न कुछ जरूर रखती हुँ ताकि जब अपने आसपास देखते ऊब जाऊ तो पढ सकु।  इसलिए मैंने अपनी आख्ने पत्रिका में गड़ा ली। तभी सामने की सीट पर बैठी महिला के पास एक व्यक्ति आकर बैठ गया। बातें षुरू हो गई। बातों से लग रहा था कि पहले से वे लोग परिचित है और आज अचानक सालों के बाद रेल के इस डिब्बे में मिल गये हेै। इस बीच उसके परिवार जो घटा  उसके बारे में वह बडे विस्तार से बता रही थी या दूसरे षब्दों में कहे तो गर्व के साथ । बातों से पता चल रहा था कि उस महिला के तीन बेटे हैं। एक दिल्ली में जिसके घर से वह वापस अपने घर जा रही थी, अच्छी कंपनी में काम करता था। दूसरा नासा में वैज्ञानिक बता रही थी। और तीसरा आईएएस की तैयारी इलाहाबाद में कर रहा था। उस महिला के अनुसार बेटे बहुत ही होनहार, पढाकू और षिक्षित है। बताने के अनुसार वास्तविकता भी यही लग रही थी। लड़की के बारे में पूछने पर बताया कि षहर में ही पढाई पूरी करने के बाद शादी कर दी। यह बताते हुये उसने गहरी सांस ली।
काफी देर बातें करने के बाद वह व्यक्ति वहां से चला गया। इधर - उधर  देखने के बाद उसकी नजर मुझ पर गई। महिला की बातें खतम होने के बाद अब मैं अपनी पत्रिका पर ध्यान लगाने की कोषिष कर रही थी। इसी दौरान जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा एक मुस्कान के साथ पूछ बैठी- कहां जा रही हो? मैंने कहा- घर। घर कहां?-उसने पूछा। मैंने बता दिया। बहुत ही खुष होकर बोली अच्छा! मैं भी वहीं जा रही हूं। वहीं की रहने वाली हूं। फिर पूछा कि मैं दिल्ली में क्या करती हूं? मैंने बता दिया कि जाॅब करती हूं। कहां तक पढ़ी हूं? मैंने यह भी बता दिया। तो वह बोली-हां! अब इतना पढ़ गई हो तो...। उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया। पर उनके सवाल बंद नहीं हुये, फिर पूछा- षादी हुयी कि नहीं। मैंने कहा कि नहीं। तो उसने कहा कि हां, नौकरी करने लगी हो तो...। फिर उन्होंने वाक्य अध्ूरा छोड़ दिया। इतनी बातों के बाद मैंने अपना ध्यान फिर से पत्रिका में लगा लिया। पर इस महिला का विरोधभाश पूरे रास्ते कचोटता रहा। थोड़ी देर पहले जो अपने बेटों की पढ़ाई और उनकी नौकरी के गुणगान कर गर्व महसूस कर रही थी वही मेरी पढ़ाई और नौकरी पर खुश होने की बाजाय कटाक्षपूर्ण टिप्पणी करके चुप हो गई। इस मामले में मेरा लड़की होना कहीं न कहीं उन्हें चुभ रहा था।
भारत में लैंगिक भेदभाव हर घर में किसी न किसी रूप में मिल जाता है। चाहे कोई कितना भी प्रगतिशील होने का दावा करे पर सच्चाई यही है कि लड़कियों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानकर उनको उसी नजर से देखते है। नही ंतो कोई कारण नहीं था कि एक संपंन घर के तीनों बेटे अच्छी पढ़ाई करके अपने उज्जवल भविश्य का निर्माण कर रहे हों वहीं उस घर की बेटी को मात्र इसलिए पढ़ा-लिखा दिया हो कि उसकी शादी सही जगह हो सके। इसी मानसिकता से ग्रसित लोग लड़कियों की सार्वजनिक उन्नति से प्रसन्न नहीं होते। उनकी सफलता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती है। इसलिए उक्त महिला ने मेरे बारे में  ऐसी टिप्पणी की। यह बहुत ही छोटी मगर गौर करने वाली बात है कि माता-पिता बड़े गर्व से यह कहते हुये मिल जाते है कि हमने अपनी लड़कियों को लड़कों की तरह पाला है। गोया कि लड़कियों को लड़कियों की तरह पाला ही नहीं जा सकता। यह गर्व वाली बात ''लड़कियों को लड़कों'' की तरह,  उसी मानसिकता की ओर इशारा करती है कि जिन सुविधा और अधिकारो के अध्किारी लड़के मात्र है वह हमने अपनी लड़कियों को उपलब्ध करा कर उनका जीवन सुफल कर दिया।
एक अहसान के साथ उन्हें यह पल-पल बताया जाता रहता है कि देखो, हमने तुममे और तुम्हारे भाइयों में कभी कोई फर्क नहीं किया। जैसे फर्क करना माता-पिता का हक होता है? लड़कियों को कमतर आंकने वाली मानसिकता के कारण ही उस महिला ने ऐसा आचरण किया। जिसके प्रति वह बिलकुल अंजान थी। आखिर ऐसी मानसिकता बदलते-बदलते ही बदलेगी।

शनिवार, 7 मार्च 2015

हर दिन महिला दिवस

हमें राजनीतिक और सामाजिक रूप से किसी दिवस मनाने की आवष्यकता तब पड़ती है जब हमें पता होता है कि अमुक बात या मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचना है। इसलिए देष में महिला दिवस के माध्यम से उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पिछड़ेपन और उनसे जुड़ी समस्याओं के बारे चर्चा करते हैं। पर इन तथाकथित दिवसों पर सवाल तब उठता है जब ‘दिवस’ महज औपचारिकता निर्वाह का साधन बन जाता है किसी परिवर्तन की कोई दस्तक इतने समय बाद भी दिखलाई नहीं पड़ती है।
इसकी वजह है हमारा मानस जो आज भी अपनी बहू-बेटियों और पत्नी-मां के प्रति बदला नहीं है। यह बात मैं दोनों स्त्री और पुरूशें के संदर्भ में कह रही हंू। महिला दिवस मनाना ऐसा लगता है जैसे किसी एक दिन हम कन्या भोज कराकर पुण्य कमा लेते है और अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते है। तो अगर हम वास्तव में महिला दिवस से कुछ हासिल करना चाहते है तो मेरी अपने समाज से गुजारिष है  िकवे कृपया महिलाओं को देवी और बहुत हद तक ‘सजावटी वस्तु’ का दर्जा देने से बचे। उन्हें अपनी संपत्ति तो कतई न समझे। उन्हें साधारण इंसान जानकर उनके लिए इस बात को सुनिष्चित करे किवे सामाजिक और राजनीतिक तौर पर स्वतंत्रता, समानता जैसे अधिकारों का उपयोग कर सके। ऐसा नहीं है कि एक नागरिक के रूप में हमें यह अधिकार प्राप्त नहीं है? हमारे संविधान ने सभी स्त्री और पुरूशों को यह अधिकार दिये है। समस्या लागू और उनके उपयोग की है।
दूसरी बात महिलाओं से कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखें। इसके लिए उन्हें राजनीतिक रूप् से एक दवाब ग्रुप के तौर पर उभरना होगा। इसके लिए पहले उन्हंे अपने अधिकारों के प्रति सजग होना सीखना होगा। महिला आरक्षण के बाद हम राजनीति में सहभागी तो जाएगें, पर हम वहीं राजनीति करेंगे जो स्थापनाएं अभी तक पुरूषों ने राजनीतिक क्षेत्र में खड़ी की हैं। भारत में महिलाएं भी एक लोकतांत्रिक देष की तरह रह रही हैं, उनके लिए भी संवैधानिक अधिकार संविधान ने दिए है। फिर भी आज तक वे अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए कहीं नजर नहीं आती हैं? वोट भी वे अपने परिवार या पति के कहने पर दे आतीं हैं। यह राजनीतिक सहभागिता नहीं है। किसी भी तरह की जानकारी और सूचना हासिल करना, राजनीतिक कार्यो में पारदर्षिता की मांग, सामाजिक मुद्दों पर बहस व संगोश्ठि करना, विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना, प्रतिनिधियों और जनता के बीच संवाद कायम करना आदि कार्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होते है, इन सभी में महिलाओं को बढ़-चढ़ कर योगदान करना चाहिए। तभी वे अपने लिए कुछ परिवर्तन करा सकती हैं। घर में बैठकर इंतजार नहीं करना चाहिए कि परिवर्तन अपने आप हो जाएगा। हमें हर रोज महिला दिवस का स्मरण रखना चाहिए किसी एक दिन नहीं।