रविवार, 15 अक्तूबर 2017

देवी पूजन : गुम होता बचपन

शक्ति पूजन भारतीय संस्कृति और धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश के एक भाग में नहीं बल्कि पूरे देश में शक्ति के रूप में स्त्री रूप का ही पूजन होता है। नवरात्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इन्हीं नवरात्र के दौरान देश के कई मंदिरों में कई वर्षो या यूं कहें कई सौ, हजार वर्षों से शक्ति रूप में कई प्रकार की देवियों की अराधना की जा रही है। आज भी वे अपने पुराने रूप यानी परंपरा के रूप में मान्य हैं। हर परंपरा अपने समय-काल के अनुसार सही हो ऐसा जरूरी नहीं होता। ऐसी ही एक घटना प्रकाश में आई है। तमिलनाडु के मदुरै के वेल्लूर में येजहायकथा अम्मान मंदिर में एक धार्मिक परंपरा पूरा करने के लिए सात या उससे अधिक कुंवारी लड़कियों को देवी के रूप में सजाया जाता है। देवी के रूप में सजी इन लड़कियों की पंद्रह दिनों तक लोग इनकी पूजा-अर्चना करते हैं। यहां तक तो सब सामान्य बात है, पर इस समारोह की समाप्ति पर पांच लड़के इन लड़कियों के ऊपरी वस्त्रों को एक-एक कर हटाने का उपक्रम करते हैं और इसी टॉपलेस अवस्था में उन्हें मंदिर के समारोह में शामिल भी किया जाता है। जिससे आमलोग उनके दर्शन कर सकें। धार्मिक परंपरा के नाम लड़कियों के साथ ऐसा व्यवहार आज क्षम्य नहीं माना जा सकता है। मीडिया में जब यह खबर इस तरह की तस्वीरों के साथ रिपोर्ट हुईं और चारों तरफ आलोचना होने लगी तब प्रशासन भी चौकन्ना हुआ। और इस बात की तस्दीक की तथा अश्वासन दिया कि इन देवी बनी इन बच्चियों को उनके परिवार की निगरानी में रखा जाएगा। उनके साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार नहीं होने दिया जाएगा।
मीडिया में खबरें आने के बाद यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी अपने संज्ञान में लिया और राज्य सरकार को इस बावत पत्र लिखा। आयोग ने इस पूरे मामले को अमानवीय करार दिया। इस अमानवीय व्यवहार को लेकर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश सरकार और पुलिस प्रमुखों को नोटिस जारी किए। आयोग का मानना है कि इन बच्चियों को कथिततौर से प्रतिबंधित देवदासी जैसी एक पुरानी प्रथा के तहत जबर्दस्ती मंदिरों में ले जाया जाता हैआयोग ने कहा कि इस परंपरा के जारी रहने के बारे में शिकायत के साथ ही मीडिया की ख़बरों में लगाए गए गंभीर आरोप हैं। इसलिए आयोग ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी करके चार सप्ताह में रिपोर्ट मांगी हैं। आयोग के अनुसार इन बच्चियों को उनके परिवारों के साथ नहीं रहने दिया जाता और उन्हें स्कूल से भी वंचित कर दिया जाता है। उन्हें मातम्मा मंदिर में ही रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता हैआयोग ने कहा कि यदि आरोप सही हैं, तो ये मानवाधिकारों का उल्लंघन है आयोग ने एक बयान में कहा कि यह कथित रूप से देवदासी प्रथा के एक अन्य रूप है। आयोग की इन चिंताओं के बरक्स प्रशासन की माने तो उनका कहना है कि यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है। इसके लिए लड़कियों का चुनाव उनके घरवालों की सहमति के बाद ही होता है। जबरदस्ती ऐसा किया जा रहा है, इस संबंध में हमें अब तक कोई शिकायत नहीं मिली है। वास्तविक तस्वीर आनी अभी शेष है, पर जो हुआ उसे मानवीय तो नहीं कहा जा सकता है। इस प्रथा का विरोध कर रहे समाजसेवी संगठनों का कहना है कि प्रशासन चाहे जो भी कहे, पर सच्चाई इसके उलट है। परंपरा के नाम पर सात से दस साल की सैकड़ों बच्चियां इस त्योहार के दौरान मंदिर में रहती हैं। इन लड़कियों को तमिलनाडु में मतम्मा कहा जाता है। आगे इन लड़कियों की शादी-ब्याह पर रोक लग जाती है, इन्हें अपनी जीविका नाच-गाकर चलानी पड़ती है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस 200 वर्ष पुरानी धार्मिक परंपरा को देवदासी का एक रूप मानकर इस मामले की तह तक जा रहा है। देवदासी प्रथा को 1982 और 1988 में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में प्रतिबंधित कर दी गई है। लेकिन यहां आज भी इस प्रथा का प्रचलन हो रहा है। 2013 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देश में करीब 4,50,000 संख्या में देवदासी होने की बात कही। वहीं 2015 में जस्टिस रघुनाथ राव की कमेटी ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 80,000 देवदासी होने की बात कही। देवदासी प्रथा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उडीशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में चली आ रही है। इस प्रथा के अनुसार एक लड़की का विवाह भगवान से कर दिया जाता था। आजीवन वह लड़की भगवान की पत्नी या प्रेयसी के रूप में मंदिर में रहकर मंदिर की सेवा, पूजा-पाठ और देखरेख् करती है। उन्हें नाचने-गाने जैसी कई कलाओं को भी सिखाया जाता था। उनकी इस कला का प्रदर्शन मंदिर के कई समारोहों में किया जाता था। बदलते वक्त के साथ इन युवतियों का शारीरिक शोषण मुख्य उद्देश्य बन गया। यह प्रथा छठी और सातवीं शताब्दी पर अपने पूरे रूप में थी। यह प्रथा चोल, चेर और पांडया शासकों के शासनकाल में खूब फली-फूली। इस प्रथा का किसी न किसी रूप में अभी भी जारी रहना लड़कियों और महिलाओं के शोषण की कथा बयां कर रही है।
धार्मिक परंपरा के नाम छोटी बच्चियों को यूं मंदिरों में दान करना या मातम्मा मंदिर की हाल की घटना किसी भी अर्थ में मान्य नहीं कहा जा सकता है। इस धार्मिक संस्कार के नाम पर उन्हें सामान्य जीवन से वंचित कर देना एक अपराध और गैर मानवीय कर्म होता है। ऐसा नहीं है कि इस तरह की प्रथा हमारे देश में ही प्रचलित है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी कुमारी, कुमारी देवी या जीवित देवी के रूप में लगभग दो हजार साल से एक प्रथा प्रचलित है। इसमें एक ऐसी बच्ची को देवी घोषित कर दिया जाता है जिसने विशेष ग्रह-नक्षत्रों में जन्म लिया हो। जैसे की तिब्बत में लामा चुनने का काम होता है। बच्ची के विशेष गुणों की परीक्षा के बाद देवी के रूप में मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है। हाल ही में 28 सितंबर को तृष्णा शाक्य को नई कुमारी के रूप में देवी घोषित कर दिया गया हैं। घोषित कुमारी देवी को काठमांडू के नेवार समुदाय से संबंधित लोग तलाजू देवी का अवतार मानकर पूजते हैं। देवी घोषित होने के बाद ऐसी बच्ची को परिवार से दूर रहना होता है, उसे मात्र 13 बार ही विशेष अवसरों पर मठ को छोड़ने की अनुमति होती। देवी घोषित यह बालिका तब तक देवी रहती हैं, जब तक मासिकधर्म शुरू नहीं हो जाता। मासिकधर्म शुरू होने के बाद युवा मानकर इनकी जगह दूसरी कन्या का चयन देवी के रूप में कर लिया जाता है। देवी कुमारी को देवी की तरह साज-सज्जा के साथ एक देवी जैसा आचरण करना होता है। इस दौरान उन्हें धार्मिक शिक्षाएं भी दी जाती है। इन कुमारी देवी की असली मुसीबत तब शुरू होती है, जब इन्हें सामान्य जीवन में लौटना होता है। इन देवियों के संबंध में इस प्रकार की मान्यता भी प्रचलित है कि इनसे जो शादी करेगा, वह अल्पायु में ही मर जाएगा। इस कारण से इन देवी रह चुकी युवतियों से विवाह करने को कोई तैयार नहीं होता। इससे अधिकांश देवी रह चुकीं कुंवारियां कुंवारी ही रह जाती हैं। हालांकि इन्हें आजीवन पेंशन के रूप में कुछ धनराशि और रहने के लिए सरकारी आवास दिया जाता है।
सवाल उठता है कि सामान्य जीवन जीने तक के लिए मोहताज कर देने वाली इन धार्मिक प्रथाओं जारी रखने के पीछे क्या औचित्य है? सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त इन धार्मिक कृत्यों के पीछे क्या कारक हो सकते हैं? किन समाजों की लड़कियां इस तरह के कृत्यों को ढो रही हैं और क्यों? इस तरह के प्रश्नों से इतर यह परंपराएं बाल अधिकारों का हनन ज्यादा हैं। एक मानवीय दृष्टिकोण से आस्था का यह मामला सवालिया घेरे में ही आते हैं। मासूम बच्चियों का बचपन और समाजिकता छीन लेने वाले यह धार्मिक उपक्रम कब तक सामाजिक स्वीकृति पाते रहेंगे?


('युगवार्ता' सप्ताहिक में प्रकाशित)

सोमवार, 4 सितंबर 2017

मौत के खेल का चैलेंज

एक अंग्रेजी कहावत है- नो रिस्क, नो गेम। हमने खेल में तलवारबाजी, घुड़दौड़, जल्लीकुट्टू या फिर आधुनिक समय के मौत का कुंआ, हांटेड हाउस, रेस ऐसे बहुतेरे खेल हैं, जहां एक व्यक्ति रोमांच और मनोरंजन पाने के लिए खेलता है। इन खेलों को पौरुष से भी जोड़कर देखा जाता था। इन खेलों को खेलने वाले को पता होता है कि वह क्या खेल खेल रहा है, पर एक ऐसा खेल जहां खेलने वाले को पता ही नहीं होता है कि वह खेल खेल रहा है या उसके साथ कोई खेल रहा है। यह कंप्यूटर युग का एक ऐसा खेल है, जो सामने वाले के दिमाग से खेलता है। एक अवस्था के बाद खिलाड़ी मनोवैज्ञानिक रूप से एक लाचारी की अवस्था तक पहुंचा दिया जाता है। एक ऐसी लाचारी जहां वह सामने वाले के कहने पर अपना जीवन उसके बताए तरीके से समाप्त कर लेता है। ऐसा खेल खेलने वाले कोई पौरुषवान व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे हमारे बच्चे हैं, जो अपना समय बिताने और थोड़ा सा रोमांच पाने के लिए सोशल मीडिया में चले जाते हैं। और मौत का खेल खेलते हुए शौक से अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। इस खेल का नाम है ब्लू व्हेल गेम, जिसकी परिणति खेलने वाले की मौत होती है।
कंप्यूटर ज्ञान का मतलब आधुनिकता से लगाया जाता है। हम सब जानते हैं कि हमारे बच्चे भी इस तकनीकी से अछूते नहीं रहे हैं। कंप्यूटर ज्ञान के साथ-साथ बच्चे अपना समय बिताने के लिए मनोरंजन के कई साधन यहां तलाश लेते हैं। इसे और भी आसान बनाया है स्मार्ट फोन ने। छह इंच का स्मार्ट फोन बच्चों के हाथ में एक तिलिस्म की तरह आ गया है। इसमें वे अपना संसार ढूढ़ते हैं। माता-पिता भी बच्चों को इस यंत्र के हवाले कर के पैसा और शोहरत कमाने की धुन में लग जाते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा जो बाहर की दुनिया के बारे में अंजान रहता है, इस दुनिया के फरेब में आ जाता है। जिन माता-पिता को ऐसे मामलों पर उनसे बात करनी चाहिए और उन्हें गाइड करना चाहिए था, वे यह सब करने में असफल रहते हैं। इसलिए बहुत से मामलों में बच्चे ठगे जाते हैं, बहलाए जाते हैं, जिसका परिणाम अंतत: आत्महत्या हो जाता है।
ब्लू व्हेल चैलेंज गेम इस आभासी दुनिया का ऐसा ही खेल है, जो बच्चों को गुमराह करके उन्हें मृत्यु के मुहाने पर ले जाता है। इस खेल के प्रभाव में आकर अब तक दुनियाभर के करीब 250 बच्चों ने अपनी जान गवा दी है। हमारे देश में एक अगस्त को पहला मामला सामने आया, जब मुंबई के अंधेरी में 14 साल के मनप्रीत ने आत्महत्या कर ली। छानबीन के बाद पता चला कि नौवीं में पढ़ने वाले मनप्रीत ने पूरे प्लान के साथ एम्पायर हाइट्स की सातवीं मंजिल की छत से कूदकर आत्महत्या की। इसी तरह जमशेदपुर के पंद्रह वर्षीय बेटे फरदीन खान ने झील में कूदकर अपनी जान ले ली। इस गेम के मुताबिक वह अपना आखिरी टॉस्क पूरा करने रात को घर से निकला था। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर के दसवीं में पढ़ने वाले अंकन डे ने फांसी लगाकर जान दे दी। अंकन के दोस्तों के अनुसार उसे ब्लू व्हेल खेलने की लत थी। इंदौर के एक सातवीं में पढ़ने वाले छात्र ने तीसरी मंजिल से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। देखा जा सकता है कि इस तरह के मामले एक के बाद एक हमारे देश भी देखे जा रहे हैं। जो बता रहा है कि हमारा समाज भी उसी आधुनिकता के छद्म की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अब तक दुनियाभर में 250  से ज्यादा बच्चों की जान इस गेम को खेलने की वजह से हो चुकी है। इसमें अकेले रूस में ही 130 बच्चों की मौत होने की गणना की गई है। रूस में इस गेम में सुसाइड का पहला केस साल 2015 में आया थारूस के अतिरिक्त अमेरिका, वेनेजुएला, ब्राजील, केन्या, अर्जेंटीना, पराग्वे, इटली, पुर्तगाल, साऊदी अरब और चीन में इस खेल ने अपना खूनी खेल जारी रखा है। प्रमुख रूप से इन देशों में इस खेल के प्रभाव में आकर सैकड़ों बच्चों ने आत्महत्या कर ली है।
ब्लू व्हेल गेम के खतरों को देखते हुए सरकार और प्रशासन सतर्क हो चुका है। कुछ बच्चों की आत्महत्या को देखते हुए कानून एवं आइटी मंत्रालय ने सभी तकनीकी मंचों को यह दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे तत्काल प्रभाव से इस गेम को डीलिंक कर दें। वैसे हमारी आइटी विभाग की नयमावली कहती है कि छोटे बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली किसी भी सामग्री को अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसी क्रम में सीबीएसई ने स्कूलों में इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गैजेट्स के उपयोग के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसमें साफतौर से इस बात की ताकीद की है कि बच्चे स्मार्टफोन, टैबलेट, आईपैड, लैपटॉप जैसे उपकरण स्कूल में इजाजत के बगैर न ला सकें। बच्चों सुरक्षित तरीके से इंटरनेट के उपयोग के बारे में अध्यापक उन्हें जागरुक करें। स्कूलों में सभी कंप्यूटरों में प्रभावशाली फायरवाल, फिल्टर, निगरानी साफ्टवेयर जैसे सुरक्षा उपायों को लगाना सुनिश्चित करना होगा। साथ ही सभी कंप्यूटर में पैरेंटल कंट्रोल फिल्टर एवं एंटी वायरस अपलोड करना होगा। बोर्ड को काफी जोर स्मार्टफोन को लेकर है। आजकल माता-पिता बच्चों को स्मार्टफोन आसानी से खरीदकर दे देते है। चूंकि फोन उनकी पर्सनल प्रापर्टी होती है इसलिए इस बात की आशंका अधिक हो जाती है कि बच्चा किसी ऐसी गतिविधियों में लिप्त हो जाए। इसलिए सीबीएसई बोर्ड ने स्कूल प्राचार्य और स्कूल बसों में परिवहन प्रभारी को इस बात का ध्यान में रखने के निर्देश हैँ।
भारतीय इलेक्ट्रानिक्स और आईटी मंत्रालय ने गूगल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम और याहू को इस गेम से संबंधित ऐसे लिंक हटाने की ताकीद की थी। साथ ही इस गेम बैन करने संबंधी एक याचिका महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने भी दायर की है। रुस जहां सबसे ज्यादा बच्चों ने इस खेल के कारण आत्महत्याएं की हैं, वहां की संसद ड्यूमा इसी 26 मई को इस तरह के खेल खिलाने वाले ग्रुप्स को क्रिमिनल रूप से उत्तरदायी मानी जाएगी। वहां के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने इस लॉ पर साइन किया जिसमें अधिकत छह महीने जेल की सजा हो सकती है। 
कैसे बचाए अपने बच्चों को
इस संबंध में मनोवैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि बच्चा जब अपनों से प्यार नहीं पाता है, तो वह अकेलेपन का शिकार हो जाता है। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह कुछ दोस्त ढूढ़ता है और इस तरह के दोस्त उसे सोशल मीडिया में मिल जाते हैं। जो उसकी बातें सुनते हैं और उनको प्रोत्साहित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में कभी कभी वे ऐसे खेल खेलने वाले ग्रुप के चक्कर में भी पड़ जाते हैं। इसलिए मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों से कम्युनिकेशन बनाए रखे ताकि बच्चा आपसी परेशानियां खुद ही शेयर करने लगे। बच्चा अपने कंप्युटर और स्मार्ट फोन पर क्या कर रहा है, इस पर समय समय पर नजर रखनी चाहिए। अब स्कूलों को भी इस तरह के निर्देश दे दिए गए हैं। मनोविश्लेषक इस गेम को खेलने वाले या प्रभावित बच्चों के कुछ लक्षण बताते हैं, जैसे बच्चा अचानक अपने दोस्तों से कट जाए, बाहर खेलना कम कर दे, अपने फोन और कंप्यूटर पर अधिक समय बिताए, तो उस पर नजर रखकर मां-पिता को बच्चों से बात करनी चाहिए। हो सकता है कि केवल इतना ही करके हम अपने अपने बच्चों की कीमती जान बचा पाएं।

रविवार, 27 अगस्त 2017

हमारी है हर तीसरी बालिका वधु

सालों-साल चला बालिका वधु टीवी सीरियल दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने बाल विवाह के प्रति लोगों का काफी ध्यान खींचा था। हाल ही सोनी चैनल पर पहरेदार पिया की नाम से एक सीरियल चल रहा है। इसकी थीम बाल विवाह तो नहीं कही जा सकती, पर उसमें बाल विवाह जरूर दिखाया गया है। राजस्थान के अमीर रजवाडे घराने के 10 साल के बेटे की शादी किन्ही परिस्थतियों के चलते एक अठारह साल की युवती से कराई जाती है और वह अपने पति की पहरेदार बन जाती है। इस सीरियल पर आरोप लग रहे हैं कि यह बाल विवाह और पुरुष सत्ता जैसी चीजों को बढ़ावा दे रहा है। विरोधस्वरूप इस सीरियल के खिलाफ ऑनलाइन पीटिशन दायर की गई है, जिस पर अब तक पचास हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी सहमति दी है। इस पूरे मामले को सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने संज्ञान में लेते हुए इसे प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद यानी बीसीसीसी के पास भेज दिया है। बीसीसीसी ने सोनी से सीरियल का समय बदलने के लिए भी कहा है। साथ ही यह भी हिदायत दी है कि इस सीरियल के साथ एक चेतावनी यह भी चलाई जाए कि यह सीरियल बाल विवाह हो बढ़ावा नहीं दे रहा है।
टीवी पर चलने वाले अधिकांश सीरियल जिनमें पारिवारिक और सामाजिक होने का टैग लगा होता है, आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करते हैं और यह हर घर के ड्राइंगरूम में रखे टीवी में चलते हैं। काफी देखे भी जाते हैं। यहीं कारण है कि पिटिशन दायर होने पर सोनी टीवी अपनी सफाई में कहते हैँ कि हम कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा रहे हैं। हम पारंपरिक लोग हैं, और अपनी सीमाएं जानते हैं। क्या ग्रामीण, क्या शहरी और क्या मैट्रो सिटी से संबंध रखने वाले लोग, सभी बाल विवाह की इस प्रथा को किसी न किसी स्तर पर पचाते हुए दिखते हैं। चाहे वह मनोरंजन के नाम पर हो या फिर उनके आसपास किसी मजबूरीवश होने वाले बाल विवाह। देश में कुछ हजार और लाख लोग ही लोग इस तरह के मामलों में सक्रीय होते दिख रहे हैं। यही बदलाव हमें चेंज डॉट आर्ग नाम बेवसाइट पर दिखता महसूस हो रहा है। लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि विश्व में होने वाले बाल विवाह में प्रत्येक तीसरी बाल बधु हमारे देश की होती हैं। यह हाल में हुए अध्ययन में दिखाया गया।
हाल ही जारी एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट एलिमिनेटिंग चाइल्ड मैरिज इन इंडिया: प्रोग्रेस एंड प्रॉस्पेक्ट्समें बताया गया है कि भारत में दुनिया की करीब 33 प्रतिशत बाल वधुएं हैं और करीब 10.3 करोड़ भारतीयों की शादी अठारह साल से पहले हो जाती हैरिपोर्ट में 2011 की जनगणना आंकड़ों को आधार बनाकर विश्लेषण करने के बाद कहा गया कि देश में हो रहे 10.3 करोड़ बाल विवाहों की संख्या फिलीपीन्स (10 करोड़) और जर्मनी (8 करोड़) की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। इन आंकड़ों के मूल्यांकन से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक विकसित देश की जनसंख्या से अधिक हमारे यहां बाल विवाह संपन्न करा दिए जाते हैँ। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सब सामाजिक सहमति से ही होते हैँ। हमारी सामाजिक सहमति को देखते हुए ही इस तरह के सीरियल अपनी लोकप्रियता की मिसाल कायम कर लेते हैं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। इसी तरह की बात भारत वार्षिक सेंसस 2011 भी कहता है कि 12 मिलियन लोगों की शादी उनकी 10 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले हो जाती है। दुर्भाग्य यह है कि इनमें से 65 प्रतिशत लड़कियां होती हैं।
अभी भी बाल विवाह का समर्थन करने वाले इस बात की ताकीद करते हैं कि बचपन में शादी करने से कुछ भी गलत नहीं होता है क्योंकि हम गौना (शादी के कुछ सालों बाद लड़की को ससुराल भेजने का रिवाज) बाद में करते हैं। इसलिए कम उम्र में शादी होने से होने वाले नुकसान, जो गिनाए जाते हैं, नहीं होते हैं। एक्शन एड इंडिया की रिपोर्ट की माने तो 18 साल से कम उम्र होने वाली 10.3 करोड़ भारतीयों में से करीब 8.52 करोड़ की संख्या लड़कियों की होती है। इसी तरह इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, आने वाली हमारी भावी पीढ़ी पर भी पड़ता है। उनकी आने वाली संतानें न केवल कुपोषण का शिकार होती हैं बल्कि वे अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर उठाने में नाकामयाब रहती हैं। शिशु एवं मातृ मुत्यु दर में इजाफा के मूल में बाल विवाह एक बड़ा कारण है। इसी रिपोर्ट की माने तो बालिकाओं के बाल विवाह रोकने से तकरीबन 27 हजार नवजातों, 55 हजार शिशुओं की मौत और 1,60,000 बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के लेखक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एसिस्टेंस प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास गोली कहते हैं कि बाल विवाह केवल मानवाधिकार और लिंग आधारित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनांनकीय के स्वास्थ, शिक्षा, और आर्थिक उन्नति के मामले के गंभीर परिणाम हैं। महिलाएं हमारी आधी आबादी हैं और यदि हम बाल विवाह से नहीं लड़ पा रहे हैं, तो यह हमारी आर्थिक व्यवस्था को अस्वस्थ और अकुशल मैन पॉवर उपलब्ध कराएगी जो हमारी आर्थिक ग्रोथ, जिसकी दोगुना करने की आशा व्यक्त की जाती है, इसे कम कर देगी।प्रश्न उठता है कि इतनी जागरुकता अभियान जो सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर चलाए जा रहे हैं, के बावजूद बाल विवाह रुक क्यों नहीं रहा है। इसके मूल में ऐसे कौन से कारण होते हैं, जो सभी तरह के नुकसान को देखते हुए भी मां-बाप बाल विवाह करने से नहीं चूकते हैं। देश में अधिकांश घरों में लड़कियों को बोझ माना जाता है और इस बोझ को उतारने की प्रक्रिया उनकी कम उम्र में शादी के रूप में देखी जाती है। इसमें गरीबी भी एक प्रमुख कारण होता है, जहां लड़की को उसके ससुराल भेजने की जल्दी दिखाई जाती है। समाज में दहेज का लेन-देन भी लड़की जल्दी शादी कर देने का कारण माना जा सकता है। जल्दी शादी करने से लड़के वाले दहेज ज्यादा नहीं मांगते हैं। हमारे समाज का ढांचा इस तरह का है कि लड़कियां दूसरे घर की धरोहर मानी जाती है। उन्हें घर तक सीमित रखते हुए जल्दी से जल्दी ससुराल भेजना मानकर चला जाता है, इसलिए लड़कियों की शादी कर दूसरे घर भेजने में ही इतिश्री समझी जाती है। कुछ समाजों में पितृसत्ता और सामंतवाद इतना हावी रहता है कि वे बेटियों और बहुओं को अपने अनुसार कंट्रोल करना चाहते हैं, इसलिए कम उम्र में ही उन्हें घर-गृहस्थी के चक्कर में डालकर मां-बाप एक चिंता से मुक्ति पा लेना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त समाज में लड़कियों के लिए असुरक्षा का भाव और माहोल भी उनकी जल्दी शादी के लिए मां-बाप को इस ओर प्रेरित करता है।
अब यह भी प्रश्न उठता है कि बाल विवाह जो इतने प्रयासों से थम नहीं रहा है, तो कैसे इसके हानिकारक प्रभावों को दूर किया जा सकता है। वास्तव में बच्चों का बचपन छीनकर उन्हें घर गृहस्थी के भार से लादने वाले माता-पिता गरीबी और अशिक्षा के दुष्चक्र में फंसे होते हैं। इसलिए लड़कियों के भार को दूसरे घर भेजने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। लड़कियों को भार न समझा जाए, इसके लिए बच्चियों के पैदा होने और बड़े होने के साथ होने वाली शिक्षा की व्यवस्था को सरकार को समझना चाहिए। ऐसी योजनाओं को बढावा भी देना चाहिए। एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट जारी करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अभिनेत्री शबाना आजमी की कही इस बात से समझा जा सकता है कि पितृसत्ता बाल विवाह की जड़ में है और बाल विवाह रोकने के लिए पितृसत्ता से पूरी तरह से निपटना होगा लड़कियों को शिक्षित करना और उनमें भरोसा पैदा करना होगा ताकि वे बाल विवाह का विरोध करें और अपने जीवन के बारे में खुद फैसला करें

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

और मैं स्वतंत्रता दिवस भूल गया

मैं सुबह की मीठी नींद सो रहा था कि किसी भारी-भरकम आवाज का कानों में प्रवेश हुआ। और मैं स्वप्न लोक से इहलोक में आ गया। आंख खोलकर देखा तो मेरे सात जन्मों की संगनी भृकुटी चढ़ाये खड़ी है। मुझे अलसाते देख यथाशक्ति कोमल स्वर में बोली-‘आपकेा आपिफस नहीं जाना है?’ ‘हां! जाना है पर इतनी सुबह क्यों जगा रही हो।’ मैंने स्पष्टीकरण मांगा जो वाकई मुझे कभी नही मिला। ‘सारी जिन्दगी सोते ही रहियेगाा। आज 15 अगस्त है, आपिफस नहीं पहुंचना है?’ झुंझलाते हुये वह बोली और किसी जलजले की भांति कमरे से बाहर चली गयी। पर मुझे जोर का झटका जोर से लगा कि अरे! मैं 15 अगस्त! मैं ‘स्वतंत्रता दिवस’ कैसे भूल गया!
 मैं उध्ेड़बुन में फंस गया। मैं स्ववंत्राता दिवस क्योंकर भूल गया। यह कैसे हुआ? मैंने बचपन से लेकर अभी तक पूरे मनोयोग से मनाता आ रहा हूं। एक बार भी नहीं भूला, आज क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ? ऐसी ध्ृष्टता कैसे हुई मुझसे। यह तो कृतग्घनता हुई देश से। ऐसे कितने विचारों का आवेग मुझ पर बढने लगा। कि मेरी आंखों के आगे अंध्ेरा छाने लगा और जन गण मन का राग चारों दिशाओं में गूंजने लगा। और तत्काल मैं पफ्लैस बैक में चला गया और इस भयानक भूल का कारण तलाशने लगा।
मैं अपनी स्मृति-मशीन के द्वारा अपने पिछले सभी स्वतंत्राता दिवसों घूम रहा था। मैं बचपन में लड्डुओं के लालच में 15 अगस्त को स्कूल अवश्य जाता था। इस दिन मेरे पेट में कभी दर्द नहीं होता था। वहां होने वाले सारे कार्यक्रमों पूरे मनोयोग से देखता था जो मुझे भारस्वरूप भले ही लगते थे। पर मेरा सारा ध्यान मोदकों पर टिका रहता कि कब वह मेरे हाथ लगे और मैं घर पहुंचू। लेकिन ऐसा कापफी इंतजार के बाद सम्भव होता था। बचपन में 15 अगस्त के दिन मास्टर जी एक बात अवश्य बताते- बच्चों! हम सब 15 अगस्त को स्वतंत्रा हुये थे और इसी दिन हमें स्वतंत्रारूप से जीने का अध्किार मिला था।’ इस बात का प्रभाव किशोरावस्था तक आते-आते मेरे मन-मस्तिष्क में जबरदस्त पड़ गया कि मैं 15 अगस्त 1947 के बाद पूर्ण रूप से स्वतंत्रा हो चुका हूं। इस अवस्था में इस अध्किार को प्रयोग करने के लिये मैं हमेशा लालायित हो उठता था। लेकिन मेरी इस सोच पर तब तुषारापात हो जाता जब मैं पढ़ना नहीं चाहता और खेलने की स्वतंत्राता मांगता, दोस्तों के साथ घूमने, पफैशनेबल कपड़े पहनने एवं सिनेमा जाने की स्वतंत्राता मांगता तब पिताजी मुझे लम्बा-चैड़ा भाषण देते ओर बताते कि कितनी मेहनत के बाद वह अध्यापक बन पाये है अगर तुम्हारे यही लक्षण रहे तो तुम स्कूल का चपरासी भी नहीं बन पाओगे, समझे! और इसके बाद मेरी हर प्रकार की स्वतंत्राता पर प्रतिबंध् लग जाता। खैर, इन सब के बावजूद मैं 15 अगस्त जोरशोर से मनाता रहता। इस समय तक मैं एक चलता पुर्जा किस्म का छात्रा बन गया था। अपने जैसे विचारों वाले छोटे भाई लोगो का एक ग्रुप बना कर छुटभैरूया नेताओं की चमचागिरी कर लेता था। उन्ही के प्रोत्साहन से थोड़ी बहुत भाषणबाजी भी करने लगा था। पढ़ाई-लिखाई में तो मुझे कभी तारीपफ मिली नहीं इसलिये साल में मिलने वाले ऐसेे एक दो मौको को मैं नही छोड़ता था। और स्वतंत्राता दिवस खूब मनाता।
युवावस्था में मुझे एक सीध्ी-साध्ी लड़की से प्यार हो गया। तब स्वतंत्राता वाली मेरी भावनायें पिफर से जाग्रत हो गई।  कि प्यार करने और अपनी पसंद की लड़की से विवाह करने के लिये तो मैं स्वतंत्रा हूं। लेकिन यहां भी मैं गलत हो गया। पिता जी को मेरा प्यार पसंद नहीं आया और जल्द ही उन्होंने एक सुयोग्य-गृहकार्य दक्ष गृहलक्ष्मी से मेरी सगाई कर चैन की सांस ली। पिफर भी मैं स्वतंत्राता दिवस मनाता रहा। शादी होने के बाद गृहस्थी की गाड़ी हांकनी थी इसलिये जोड़-तोड़कर के सरकारी आॅपिफस में क्लर्की हासिल कर ली। सोचा कि यहां पर सात-आठ घंटे रहकर अपनी स्वतंत्राता का प्रयोग कर सकूगा। पर अपफसोस! अध्किारियों के आदेश पर फाइलो को इध्र-उध्र करता रहता। उपर-नीचे भी करता। कभी इसको टालता, कभी उसको टालता। उफपर से जैसे आदेश मिलते मैं वैसा ही करता। कभी स्वतंत्रा क्लर्की नहीं करता, पर हर साल मैं 15 अगस्त अवश्य मनाता। जिंदगी इन्ही स्वतंत्राओं के अपहरणों के बीच चलती रही और मैं स्वतंत्राता दिवसों को पूरे ;बुझेद्ध मन से मनाता रहा। आज भी स्वतंत्राता दिवस है मैं तैयार होकर जा रहा हूं। स्कूली पोशाक में सजे-ध्जे बच्चे तिरंगा लिये भागते चले जा रहे। तभी मुझे किसी की जोर से पुकारने की आवाज सुनाई दी। मैंने देखा कि मैं अभी भी बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं मेरी पत्नी मेरे सामने खड़ी मेरी चादर खींचते हुये कह रही है‘ऐसे ही जिंदगी भर उघांते रहना, जाइये, जल्दी से निपटाकर आइये। दूसरे भी काम करने है। बड़ी मुश्किल से कोई छुट्टी का दिन मिलता है।’



रविवार, 18 दिसंबर 2016

हम सब का चैन!

आधी रात के बाद!
वह बूढ़ा चौकीदार
डंडा टेकता हुआ
ठक ठक ठक ठक
सीटी बजाता हुआ,
रात की रखवाली करता है
चोरों से,
कि वे चुरा न ले जाए
रात की कालिमा
रात की नीरवता,
उसकी ख़ामोशी
और हम सब का चैन!!

बुधवार, 14 सितंबर 2016

डिजिटल वर्ल्ड की न्यू 'वुमनिया'


एक समय जानीमानी साहित्कार एवं महिला मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी करने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने कहा था कि आज गांव-देहात में मोबाइल ने स्त्रियों को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। लेखिका का यह कहना बिलकुल वैसे ही है जैसे कभी यूरोपियन देषों में महिला अधिकारों के समर्थकों ने कहा था कि गर्भनिरोधक उपायों ने महिलाओं को कहीं अधिक स्वतंत्र और सक्षम बनाया है। कुछ ऐसा ही तब कहा गया जब हमारे घरों की रसोई में प्रेषर कुकर और गैस-स्टोव ने दस्तक दी। इन बातों से यह पता चलता है कि टेक्नॉलजी ने स्त्रियों के जीवन में ऐसे परिवर्तन किये जिसे हमारे तथाकथित धर्म षास्त्र और तमाम कानून भी एक साथ मिलकर नहीं कर पाए। महिलाओं के हाथों में छह इंची मोबाइल ऐसा हथियार है जिसके सहारे न केवल वे आज अपने सपनों की उड़ान भर रही हैं बल्कि इस मेल डॉमिनेटिंग सोसायटी में अपना एक मुकाम और कोना तलाष रही है।
आजकल एक महिलाओं को लेकर एक नई षब्दावली चल पड़ी है ‘डिजीटल वूमन।’ यानी ऐसी महिलाएं जो खूब नेट सैवी हो और सर्फिंग में रुचि लेती हां। अगर आंकड़ों की भाषा में बात करे तो पुरुषों के मुकाबले 49 फीसदी महिलाएं आज देष में इंटरनेट यूज करती हैं। यानी आधी आबादी का एक लगभग पूरा भाग इंटरनेट का लाभ ले रहा है। इंटरनेट में उनकी उपस्थिति का यही कारण है कि सोषल मीडिया में भी महिलाएं अपनी हिस्सेदारी दिखा रही हैं। चाहे वह सबसे लोकप्रिय सोषल साइट फेसबुक हो या वाट्स-एप, सभी जगह वे अपनी मुखर आवाज के साथ उपस्थित है। ट्वीटर, गूगल प्लस, लिंकलिड्स, ब्लॉग, यू-ट्यूब ये कुछ ऐसी जगहें हैं जहां पर महिलाएं बेखौफ आकर अपने रूटीन लाइफ को आसान करती हैं और बेबाकी से अपने विचार षेयर करती हैं। आज सोषल साइट्स केवल मेट्रो सिटीज या हाई प्रोफाइल महिलाओं के जीवन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यहां पर आम घरेलू महिलाएं बडे़ षिद्दत से आती हैं। हम एक ओर तो वाट्सएप पर अपने पड़ोस की अांटी को किटी पार्टी मैनेज करते हुए देख सकते है, वहीं तेजतर्रार और सफल महिलाओं को देष-दुनिया के तमाम मुद्दों पर बहस में भाग लेते भी देख सकते हैं। ऐसी तमाम महिलाओं की उपस्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि माइक्रो ब्लॉगिंग ट्वीटर पर प्रसिद्ध उद्योपति किरण मजूमदार षॉ काफी सक्रीय हैं, वहीं लोगों का विरोध झेलने वाली पत्रकार एवं टिप्पणीकार सागरिका घोष भी हैं। बोलने के मामले में हद तक बदनाम महिलाएं अपने आपको इस मीडियम के माध्यम से अभिव्यक्त करना चाहती है और इसको आसान किया है डिजिटल टेक्नॉलजी ने। यह देखना बहुत ही दिलचस्प है कि कैसे यह छोटा सा गैजेट वूमेन लाइफ को बदलकर रख दे रहा है। यह क्या कम है कि यह डिजिटल वर्ल्ड महिलाओं के छोटे-मोटे काम ही आसान नहीं कर रहा है बल्कि उनकी सुरक्षा को भी सुनिष्चित कर रहा है।

कुछ सालों से इंटरनेट उपयोग करने वाली कुछ महिलाओं से जब बात की गई तो उन्होंने समानरूप से एक बात कबूल की कि इंटरनेट, सोषल साइट ने उनके जीवन को बदल दिया है। वे पहले से ज्यादा सोषल व एक्टिव हो गई हैं। षादी के बाद जब उन्हें लगता था कि अब स्वयं के लिए कुछ कर पाना न-मुमकिन सा हो गया है या खुद के लिए जिंदगी समाप्त सी हो गई है तब इस डिजिटल वर्ल्ड ने उनके लिए सारा संसार दिखा दिया। इस डिजिटल वर्ल्ड ने उनके लिए जीवन के कुछ नए दरवाजे खोल दिए। इससे वे ऐसी दुनिया के करीब आई हैं जो उनके लिए ‘प्रोहिवेटेड’ थी, लगभग बंद थी। आज सोषल साइट के जरिए देष के उत्तर में रहने वाली एक स्त्री दक्षिण की दूसरी या विदेष में रहने वाली महिलाएं देष की दूसरी महिलाओं के संपर्क में आसानी से आ गई है। जहां वे दिल खोलकर बोल और बतिया रही हैं। यहां पर वे अपने और उनके कष्टों और कठिनाइयों को षिद्दत से सुन और महसूस कर पा रही हैं। महिलाओं के लिए इंटरनेट केवल मनोरंजन या एंटरटेन का साधन मात्र नहीं है बल्कि इंटरनेट का यह कोना ‘ओ वुमनिया’ टाइप का है जो केवल उनके लिए ही है उनके जैसा ही है।    

शनिवार, 18 जून 2016

बुंदेलखंड सूखा : मतलब अकाल, मतलब भूख, मतलब मौत

’इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ।
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ।।
हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे।
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे।।‘
लातूर, विधर्भ की सूखे की खबरों और कवि-अभिनेता पियूष मिश्रा की इन पंक्तियांे का सबब सोचने समझने से पहले बुंदेलखंड के एक जिला महोबा से एक खबर के निहितार्थ जानने चाहिए। यहां से यह खबर आती है ‘रोटी बैंक’ चलाने की। इस बैंक के संचालक कर्ताधरता तारा पाटकर हैं जिन्हें यहां के लोगों की भूख खींच लाई। आष्चर्य है कि बैंकों की स्थापना का सिद्धांत ‘संसाधन का अतिरेक’ होता है वहीं इस ‘रोटी बैंक’ की स्थापना इसलिए की जा रही है कि लोग भूख से मर रहे हैं अर्थात रोटी की कमी है। इस रोटी बैंक से गरीब, बुजुर्गों और भिखारियों को रोटी दी जा रही है। पिछले एक साल से तारा पाटकर इस इलाके में भूख से होने वाली मौतों को मात दे रहे हैं। वजह, सूखा जो अकाल ही भूख का रूप लेकर समस्त बुंदेलखंड को सुनसान बनाने को आतुर है। भूख के लिए लोगों को खून और अपने बच्चें न बेचने पड़े और घास की रोटियां न खानी पड़े, इसके लिए समस्त बुंदेलखंड के लिए तारा पाटकर की यह पहल बहुत ही छोटी है पर यह रोज होने वाली सरकारी पैकेजनुमा घोषणाओं से बड़ी है।
पिछले साल नवंबर में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी योगेन्द्र यादव ने अपने स्वराज अभियान के जरिए ‘‘बुंदेलखंड ड्राॅट इम्पैक्ट असेसमेंट सर्वे’’ किया। यह सर्वे 27 तहसीलों के 108 गांवों में किया गया। इस सर्वे में सबसे गरीब 399 सहित कुल 1206 गरीब परिवारों को षामिल किया गया। सर्वेक्षण के सबसे चिंताजनक संकेत भुखमरी और कुपोषण से सम्बधित है। पिछले एक महीने के खान-पान के बारे में पूछने पर पता लगा कि एक औसत परिवार को महीने में सिर्फ 13 दिन सब्जी खाने को मिली, परिवार में बच्चों या बड़ों को दूध सिर्फ 6 दिन नसीब हुआ और दाल सिर्फ 4 दिन। गरीब परिवारों में आधे से ज्यादा ने पूरे महीने में एक बार भी दाल नहीं खायी थी और 69 प्रतिषत ने दूध नहीं पिया था। गरीब परिवारों में 19 प्रतिषत को पिछले माह कम से कम एक दिन भूखा सोना पड़ा।  
सर्वे से उभर के आया कि कुपोषण और भुखमरी की यह स्थिति पिछले 8 महीनों में रबी की फसल खराब होने से बिगड़ी है। सिर्फ गरीब ही नहीं, लगभग सभी सामान्य परिवारों में भी दाल और दूध का उपयोग घट गया है। यहाँ के 79 प्रतिषत परिवारों ने पिछले कुछ महीनों में कभी ना कभी रोटी या चावल को सिर्फ नमक या चटनी के साथ खाने को मजबूर हुए हैं। 17 प्रतिषत परिवारों ने घास की रोटी (फिकारा) खाने की बात कबूली। सर्वे के 108 में से 41 गावों में इस दौरान भुखमरी या कुपोषण की वजह से मौत की खबरें भी आई। इस सर्वे में आसन्न संकट के कई और प्रमाण भी सामने आये। एक तिहाई से अधिक परिवारों को खाना मांगना पड़ा, 22 प्रतिषत बच्चों को स्कूल से वापिस लेना पड़ा, 27 प्रतिषत को जमीन और 24 प्रतिषत को जेवर बेचने या गिरवी रखने पड़े हैं। मनुष्यों पर आश्रित जानवरों की तो और भी अधिक दुर्गति हो रही है। बुंदेलखंड में दुधारू जानवरों को छोड़ने की ‘अन्ना’ प्रथा में अचानक बढोत्तरी देखी गई है। 
बुंदेलखंड में कुल 13 जिले हैं जिनमें से 7 उत्तर प्रदेश में आते हैं जबकि 6 मध्यप्रदेश में आते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड की कुल आबादी 1 करोड़ 80 लाख है। जिसमें से करीब 79 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और इनमें एक तिहाई से ज्यादा घर ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं। बुंदेलखंड का इतिहास बताता  है कि 19वीं से 20वीं सदी के दौरान 12 बार सूखा और अकाल झेले चुका हैं बुंदेलखंड। सामान्यरूप से हर 16-17 साल में यहां सूखा पड़ा रहा। स्वराज अभियान ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि बुन्देलखण्ड के सबसे गरीब परिवारों के लिए भुखमरी की नौबत आ सकती है। इस क्षेत्र में लगातार तीसरे साल सूखा पड़ा है। साथ ही इस साल ओलावृष्टि, अतिवृष्टि से रबी की फसल भी नष्ट हो गयी थी। बुंदेलखंड इलाके के 60 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को विवश हैं। अधिकांशतः यहाँ  सीमांत कृषक ही है। 25 फीसदी किसान एक से दो हेक्टेयर भूमि पर अपना और परिवार का गुजर-बसर करते हैं। जब खेती और जिंदगी पर कोई संकट आता है तो लिया गया कर्ज ही इनकी जान का जान का दुश्मन बन जाता है। जिसके आंकडे़ बहुत ही भयावह है। 2015 जिसके चलते यहां के 3223 किसान 2009 से 2014 के बीच आत्म ह्त्या कके अपुष्ट आकड़ों के अनुसार 440 किसान या कृषि से अपनी जीविका चलाने वाले अपना सुकून मौत में ढूढ रहे हेैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2009 में 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745 और 2014 में 58 किसानो ने आत्महत्या की।
पिछले कुछ वर्षो में बुंदेलखंड मानसून अनियमित सा हो गया। कभी वर्षा तो कभी वर्षा की कमी, यह स्थिति निरंतर चल रही है। उस पर ओला और पाला की मार , तालाबों, बांधों और कुओं का सूख जाना, ऐसे कुछ कारण हैं जिसनेे यहां की खेती को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। फलस्वरूप खेती पर निर्भर 80 फीसदी आबादी के सामने अब भुखमरी के हालात उत्पन्न हो गए। इसलिए इन इलाकों से पलायन को वजह मिल गई है। प्रवास संस्था की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, एक दशक में करीब 62 लाख लोग बुंदेलखंड छोड़ कर जा चुके हैं। काम की तलाश में किसान मजदूर बनकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मजदूरी के लिए विवष हैं। पल्स पोलियो अभियान के दौरान एकत्रित हुए आंकड़ों और बाद में गायब हुए परिवारों की स्थिति को इस संस्था ने आधार बनाया। जिससे यह भयावह सत्य पता चलता है। बुंदेलखंड का शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां घरों में ताला न लटका हो। 
ज्यों ज्यों आसमान का पारा चढ रहा है त्यों त्यों फौरी राहत की घोषणा हो रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुंदेलखंड सहित सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के लिए कल 867.87 करोड़ रूपए मंजूर करने के बाद बुंदेलखंड के सातों जिलों में पेयजल समस्या से निपटने के लिए इंडिया मार्क-2 के 666 और हैंडपंप लगाने का निर्देश दिया। हैंडपंप की लागत राशि भी 18.42 करोड़ रूपए से बढाकर 21.57 करोड़ रूपए कर दी गई है। लेकिन सरकार को यह समझने दिक्कत क्यों है कि जब जमीन में पानी ही नहीं है तो हैंडपंप पानी कैसे दे सकता है? जलपुरूष कहें जाने वाले राजेंद्र सिंह बुंदेलखंड की इस समस्या का हल नदियों के पुर्नजीवन में ढूढ रहे हैं। नदियों का जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है, इस समय जमीन की तीसरी सतह का पानी निकाला जा रहा है, जिससे धरती का पेट खाली हो रहा है। अगर इस जमीन के खाली पेट को भरा नहीं किया गया तो यहां के लोगों को पीने का पानी कभी नहीं मिल पाएगा। जमीन का खाली पेट भरना और आदमी का खाली पेट भरने में एक अन्योन्याश्रित संबंध है जिसको जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा।
(आंशिक रूप से 'शुकलपक्ष' पत्रिका मई अंक में प्रकाशित )