मंगलवार, 24 जून 2014

मैं उसे खोजता हूं जो आदमी है!!


पता नहीं क्यों एक जनवादी कवि के बारे में लिखने से पहले देश की राजनीति और लोकतंत्र के बारे में लिखना जरूरी लग रहा हैं। हाल ही में चुनाव संपंन हुये और भारी बहुमत से नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई। विकास का वादा लेकर विकास करने के लिए जनता ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपना सब कुछ सौंप दिया। मोदी सरकार के पास पूरे पांच वर्ष है अपने आप को साबित करने के लिए। पर इन सबके बीच एक प्रष्न उठता है कि जब पफला व्यक्ति ने अपना वोट मोदी को दिया होगा तो उसके दिमाग में विकास का कौन सा कतरा अपना दिमाग के कोने में संजो रहा होगा? उसके दिमाग में विकास का कौन सा रूप आकार ले रहा होगा? जिस देश  की अधिसंख्य जनता आजादी के इतने सालों बाद भी अपनी मूल सुविधाओं को विकास का मापदंड मान रही हो और इसी खुशी में वह मोदी को जिता अपनी आपेक्षाओं को पूरा करना चाहती हो, ऐसे समय में भी जनवादी प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं प्रासंगिक हो तो कवि की महत्ता बढ़ जाती है।
अपने घर-आँगन में बाबू जी 
‘कहे केदार खरी-खरी’ संग्रह से 'देश की छाती दरकते देखता हूँ!' शीर्षक से एक लम्बी कविता लिखी है। यह पूरी कविता तत्कालिक राजनीतिक एवं सामाजिक परिवर्तन के दोहरापन को रेखांकित करती है। जिसकी कुछ पंक्तियां इस तरह से है- देश की छाती दरकते देखता हूँ!/कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते/ राजनीतिक चाल चलते/रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ!/ वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते/ झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते/ गोखुरों से सिंधु भरते/ देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!!
आज विाचारधरा और पुराने संस्कारों में परिवर्तन के कारण सारी राजनीति का यही हाल होता नजर आ रहा है। जनहित के स्थान पर स्वहित ही एकमात्र उद्देश्य  बन जाता है। राजनीति का कारपोरेट से गठबंधन  का जो नया तंत्र लोकतंत्र में सामने आया है, केदारनाथ ऐसी पूंजी का विरोध् करते रहे- थैलीशाहों की यह संस्कृति/ महामृत्यु है! कुत्ता बिल्ली से बढ़कर है/ मानवता को खा जाती है/ बेचारी धरती  रोती हैंै। स्पष्ट है कि केदार की कविता मानवता विरोधी पूंजीपतियों की संस्कृति का विरोध् करने वाली कविता है। इस संस्कृति की हरकतें बिल्ली-कुत्तों से भी आगे है। केदारनाथ व्यवसाय से वकील थे। इस कारण इनकी कविताओं की संरचना में एक सहज तर्क-प्रणाली रहती है। विशेष बात यह है कि उनके तर्क के सारे उपकरण लोक जीवन के सामान्य बोध् पर निर्भर करते हैं।
प्रगतिशील कविता की सबसे प्रखर धरा के कवि केदारनाथ अग्रवाल माने जाते है। निराला की काव्य परंपरा की सबसे सशक्त कड़ी हैं केदारनाथ अग्रवाल और उनके बाद के सबसे बड़े महाप्राण कवि भी। केदारनाथ अग्रवाल उत्तर प्रदेश के बांदा जिले कमासिन गांव से संबंध् रखते है। उनकी कर्मभूमि हमेशा बांदा रही। बांदा की कचहरी में अपनी जीविका के चलते उन्होंने बांदा और केन को अपने मन और कर्म से जिया। वकालत में उनका मन कभी नहीं लगा, इसे मात्रा जीविका का साधन बनाया। हां, जीविका के इस साधन  ने उन्हें लोगों के इतना नजदीक ला दिया कि वे उनकी समस्याओं से दो चार होते रहे और अपनी कविता में उतारते रहे।
अपने गांव कमासिन, वहां के लोग, उनका ठेठ देहातीपन, खेत-खलिहान सभी के बारे में उन्होंने खूब लिखा। बांदा में आने के बाद आमजनों की समस्याओं, उनके हित के प्रति अपने लगाव को अपनी लेखनी में उतारते रहें। केदारनाथ की सामाजिक चेतना के बारे में डाॅ. राम विलास शर्मा ने लिखा है कि तार सप्तक के अनेक कवियों के पास कम्युनिष्ट  विचार-बोध् तो था, लेकिन जुझारू किसान या मजदूर का भाव-बोध् नहीं था। इसके अभाव में उनके पैर उखड़ गये ओर केदार अपने पैर जमाएं रहे।’ उन्होंने अपने कविताओं के माध्यम से व्यक्ति की चेतना जगाने का काम किया। अपने वैचारिक एवं आम आदमी के पक्ष में किये गये सृजन को लेखकीय दायित्व की तरह लिया। वे लिखते है- मैं लड़ाई लड़ रहा हुं/ मोर्चे पर/ लेखनी की षक्ति से/ मैं कलेजा फाड़ता हूं/ मिल-मालिकों को/ अर्थ पैशाचकों को/ भूमि को हड़पे हुए/ धरणी धरों को/ मैं प्रलय से/ साम्यवादी आक्रमण से मारता हूं।
विचारमग्न बाबू जी 
केदारनाथ की कविता का उद्देष्य हमेशा से अपने पाठक की सही और यर्थाथपरक सोच को स्थापित करना था। जिससे पाठक मानवता विरोधी सभ्यता और संस्कृति का विरोध् आसानी से कर सके। देश को आजादी मिली लेकिन आजादी के नये माहौल में व्यक्तियों को उनका हक-हुकूक नहीं मिला। यह सब केदारनाथ उस समय देख और समझ रहे थे। शायद इसीलिए इन सबके प्रति वे अधिक सतर्क थे औार अपना विरोध् दर्षाते थे। आज भी यही स्थिति कामोवेश बनी हुयी है। म्ंात्राी बनते ही नेताओं के सामंती स्वभाव पर अच्छा व्यंग्य करते हुए उन्होंने ‘मंत्राी-मास्टर संवाद’ कविता में लिखा-रेल सफर मंे चलता हूं तो होती है बाधा / एक बार की यात्रा में ही हो जाता हूं आध/ इसलिए तो वायुयान की प्रिय है मुझे सवारी/ धरती  में चलने-फिरने से होती है बीमारी। अपने वकालत के पेशे  में उन्होंने बड़ी नजदीक से सत्य को झूठ में बदलते देखा है-सच ने/ जीभ नहीं पायी है/ वह तो कैसे/ असली बात कहे तो कैसे/ झूठ मरे तो कैसे।
यद्यपि केदारनाथ प्रकृति प्रेमी कवि थे। उन्होंने प्रकृति और प्रेम के बारे खूब लिखा है। पर अपने समय से वे समझौता नहीं कर सके। उनकी कविताएं समय से दो-दो हाथ करती रही। वे लिखते है- हिन्दी की कविता न रस की प्यासी है, न अलंकार की इच्छुक और न संगीत की, न तुकांत पदावली की भूखी है, भगवान अब उसके लिए व्यर्थ है, अब वह किसान और मजदूर की वाणी चाहती है।
कुल मिलाकर केदारनाथ की कविताओं की विशेषता उनकी प्रासंगिता ही है। प्रासंगिता इसलिए है कि ये मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी है, उनकी ही बात करती हैं। उनकी पक्षधरता करती हैं। यही उनकी रचना धुरी  है। इसलिए वे लिखते भी है- मैं उसे/ खोजता हूं/जो आदमी है/और अब भी आदमी है/ तबाह होकर भी आदमी है/ चरित्र पर खड़ा/ देवदार की तरह बड़ा। केदार की यह चिंता वाकई बड़ी और सामायिक है।

4 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

kedarnath ji ke baare me sarahniy jankari deti sarthak post .aabhar .

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

धन्यवाद शालिनी जी

kumar Anshuman ने कहा…

Going through the work is worthy.

संगम पांडेय ने कहा…

अच्छा लिखा है।