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सोमवार, 4 सितंबर 2017

मौत के खेल का चैलेंज

एक अंग्रेजी कहावत है- नो रिस्क, नो गेम। हमने खेल में तलवारबाजी, घुड़दौड़, जल्लीकुट्टू या फिर आधुनिक समय के मौत का कुंआ, हांटेड हाउस, रेस ऐसे बहुतेरे खेल हैं, जहां एक व्यक्ति रोमांच और मनोरंजन पाने के लिए खेलता है। इन खेलों को पौरुष से भी जोड़कर देखा जाता था। इन खेलों को खेलने वाले को पता होता है कि वह क्या खेल खेल रहा है, पर एक ऐसा खेल जहां खेलने वाले को पता ही नहीं होता है कि वह खेल खेल रहा है या उसके साथ कोई खेल रहा है। यह कंप्यूटर युग का एक ऐसा खेल है, जो सामने वाले के दिमाग से खेलता है। एक अवस्था के बाद खिलाड़ी मनोवैज्ञानिक रूप से एक लाचारी की अवस्था तक पहुंचा दिया जाता है। एक ऐसी लाचारी जहां वह सामने वाले के कहने पर अपना जीवन उसके बताए तरीके से समाप्त कर लेता है। ऐसा खेल खेलने वाले कोई पौरुषवान व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे हमारे बच्चे हैं, जो अपना समय बिताने और थोड़ा सा रोमांच पाने के लिए सोशल मीडिया में चले जाते हैं। और मौत का खेल खेलते हुए शौक से अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। इस खेल का नाम है ब्लू व्हेल गेम, जिसकी परिणति खेलने वाले की मौत होती है।
कंप्यूटर ज्ञान का मतलब आधुनिकता से लगाया जाता है। हम सब जानते हैं कि हमारे बच्चे भी इस तकनीकी से अछूते नहीं रहे हैं। कंप्यूटर ज्ञान के साथ-साथ बच्चे अपना समय बिताने के लिए मनोरंजन के कई साधन यहां तलाश लेते हैं। इसे और भी आसान बनाया है स्मार्ट फोन ने। छह इंच का स्मार्ट फोन बच्चों के हाथ में एक तिलिस्म की तरह आ गया है। इसमें वे अपना संसार ढूढ़ते हैं। माता-पिता भी बच्चों को इस यंत्र के हवाले कर के पैसा और शोहरत कमाने की धुन में लग जाते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा जो बाहर की दुनिया के बारे में अंजान रहता है, इस दुनिया के फरेब में आ जाता है। जिन माता-पिता को ऐसे मामलों पर उनसे बात करनी चाहिए और उन्हें गाइड करना चाहिए था, वे यह सब करने में असफल रहते हैं। इसलिए बहुत से मामलों में बच्चे ठगे जाते हैं, बहलाए जाते हैं, जिसका परिणाम अंतत: आत्महत्या हो जाता है।
ब्लू व्हेल चैलेंज गेम इस आभासी दुनिया का ऐसा ही खेल है, जो बच्चों को गुमराह करके उन्हें मृत्यु के मुहाने पर ले जाता है। इस खेल के प्रभाव में आकर अब तक दुनियाभर के करीब 250 बच्चों ने अपनी जान गवा दी है। हमारे देश में एक अगस्त को पहला मामला सामने आया, जब मुंबई के अंधेरी में 14 साल के मनप्रीत ने आत्महत्या कर ली। छानबीन के बाद पता चला कि नौवीं में पढ़ने वाले मनप्रीत ने पूरे प्लान के साथ एम्पायर हाइट्स की सातवीं मंजिल की छत से कूदकर आत्महत्या की। इसी तरह जमशेदपुर के पंद्रह वर्षीय बेटे फरदीन खान ने झील में कूदकर अपनी जान ले ली। इस गेम के मुताबिक वह अपना आखिरी टॉस्क पूरा करने रात को घर से निकला था। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर के दसवीं में पढ़ने वाले अंकन डे ने फांसी लगाकर जान दे दी। अंकन के दोस्तों के अनुसार उसे ब्लू व्हेल खेलने की लत थी। इंदौर के एक सातवीं में पढ़ने वाले छात्र ने तीसरी मंजिल से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। देखा जा सकता है कि इस तरह के मामले एक के बाद एक हमारे देश भी देखे जा रहे हैं। जो बता रहा है कि हमारा समाज भी उसी आधुनिकता के छद्म की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अब तक दुनियाभर में 250  से ज्यादा बच्चों की जान इस गेम को खेलने की वजह से हो चुकी है। इसमें अकेले रूस में ही 130 बच्चों की मौत होने की गणना की गई है। रूस में इस गेम में सुसाइड का पहला केस साल 2015 में आया थारूस के अतिरिक्त अमेरिका, वेनेजुएला, ब्राजील, केन्या, अर्जेंटीना, पराग्वे, इटली, पुर्तगाल, साऊदी अरब और चीन में इस खेल ने अपना खूनी खेल जारी रखा है। प्रमुख रूप से इन देशों में इस खेल के प्रभाव में आकर सैकड़ों बच्चों ने आत्महत्या कर ली है।
ब्लू व्हेल गेम के खतरों को देखते हुए सरकार और प्रशासन सतर्क हो चुका है। कुछ बच्चों की आत्महत्या को देखते हुए कानून एवं आइटी मंत्रालय ने सभी तकनीकी मंचों को यह दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे तत्काल प्रभाव से इस गेम को डीलिंक कर दें। वैसे हमारी आइटी विभाग की नयमावली कहती है कि छोटे बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली किसी भी सामग्री को अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसी क्रम में सीबीएसई ने स्कूलों में इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गैजेट्स के उपयोग के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसमें साफतौर से इस बात की ताकीद की है कि बच्चे स्मार्टफोन, टैबलेट, आईपैड, लैपटॉप जैसे उपकरण स्कूल में इजाजत के बगैर न ला सकें। बच्चों सुरक्षित तरीके से इंटरनेट के उपयोग के बारे में अध्यापक उन्हें जागरुक करें। स्कूलों में सभी कंप्यूटरों में प्रभावशाली फायरवाल, फिल्टर, निगरानी साफ्टवेयर जैसे सुरक्षा उपायों को लगाना सुनिश्चित करना होगा। साथ ही सभी कंप्यूटर में पैरेंटल कंट्रोल फिल्टर एवं एंटी वायरस अपलोड करना होगा। बोर्ड को काफी जोर स्मार्टफोन को लेकर है। आजकल माता-पिता बच्चों को स्मार्टफोन आसानी से खरीदकर दे देते है। चूंकि फोन उनकी पर्सनल प्रापर्टी होती है इसलिए इस बात की आशंका अधिक हो जाती है कि बच्चा किसी ऐसी गतिविधियों में लिप्त हो जाए। इसलिए सीबीएसई बोर्ड ने स्कूल प्राचार्य और स्कूल बसों में परिवहन प्रभारी को इस बात का ध्यान में रखने के निर्देश हैँ।
भारतीय इलेक्ट्रानिक्स और आईटी मंत्रालय ने गूगल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम और याहू को इस गेम से संबंधित ऐसे लिंक हटाने की ताकीद की थी। साथ ही इस गेम बैन करने संबंधी एक याचिका महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने भी दायर की है। रुस जहां सबसे ज्यादा बच्चों ने इस खेल के कारण आत्महत्याएं की हैं, वहां की संसद ड्यूमा इसी 26 मई को इस तरह के खेल खिलाने वाले ग्रुप्स को क्रिमिनल रूप से उत्तरदायी मानी जाएगी। वहां के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने इस लॉ पर साइन किया जिसमें अधिकत छह महीने जेल की सजा हो सकती है। 
कैसे बचाए अपने बच्चों को
इस संबंध में मनोवैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि बच्चा जब अपनों से प्यार नहीं पाता है, तो वह अकेलेपन का शिकार हो जाता है। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह कुछ दोस्त ढूढ़ता है और इस तरह के दोस्त उसे सोशल मीडिया में मिल जाते हैं। जो उसकी बातें सुनते हैं और उनको प्रोत्साहित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में कभी कभी वे ऐसे खेल खेलने वाले ग्रुप के चक्कर में भी पड़ जाते हैं। इसलिए मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों से कम्युनिकेशन बनाए रखे ताकि बच्चा आपसी परेशानियां खुद ही शेयर करने लगे। बच्चा अपने कंप्युटर और स्मार्ट फोन पर क्या कर रहा है, इस पर समय समय पर नजर रखनी चाहिए। अब स्कूलों को भी इस तरह के निर्देश दे दिए गए हैं। मनोविश्लेषक इस गेम को खेलने वाले या प्रभावित बच्चों के कुछ लक्षण बताते हैं, जैसे बच्चा अचानक अपने दोस्तों से कट जाए, बाहर खेलना कम कर दे, अपने फोन और कंप्यूटर पर अधिक समय बिताए, तो उस पर नजर रखकर मां-पिता को बच्चों से बात करनी चाहिए। हो सकता है कि केवल इतना ही करके हम अपने अपने बच्चों की कीमती जान बचा पाएं।