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रविवार, 27 अगस्त 2017

हमारी है हर तीसरी बालिका वधु

सालों-साल चला बालिका वधु टीवी सीरियल दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने बाल विवाह के प्रति लोगों का काफी ध्यान खींचा था। हाल ही सोनी चैनल पर पहरेदार पिया की नाम से एक सीरियल चल रहा है। इसकी थीम बाल विवाह तो नहीं कही जा सकती, पर उसमें बाल विवाह जरूर दिखाया गया है। राजस्थान के अमीर रजवाडे घराने के 10 साल के बेटे की शादी किन्ही परिस्थतियों के चलते एक अठारह साल की युवती से कराई जाती है और वह अपने पति की पहरेदार बन जाती है। इस सीरियल पर आरोप लग रहे हैं कि यह बाल विवाह और पुरुष सत्ता जैसी चीजों को बढ़ावा दे रहा है। विरोधस्वरूप इस सीरियल के खिलाफ ऑनलाइन पीटिशन दायर की गई है, जिस पर अब तक पचास हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी सहमति दी है। इस पूरे मामले को सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने संज्ञान में लेते हुए इसे प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद यानी बीसीसीसी के पास भेज दिया है। बीसीसीसी ने सोनी से सीरियल का समय बदलने के लिए भी कहा है। साथ ही यह भी हिदायत दी है कि इस सीरियल के साथ एक चेतावनी यह भी चलाई जाए कि यह सीरियल बाल विवाह हो बढ़ावा नहीं दे रहा है।
टीवी पर चलने वाले अधिकांश सीरियल जिनमें पारिवारिक और सामाजिक होने का टैग लगा होता है, आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करते हैं और यह हर घर के ड्राइंगरूम में रखे टीवी में चलते हैं। काफी देखे भी जाते हैं। यहीं कारण है कि पिटिशन दायर होने पर सोनी टीवी अपनी सफाई में कहते हैँ कि हम कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा रहे हैं। हम पारंपरिक लोग हैं, और अपनी सीमाएं जानते हैं। क्या ग्रामीण, क्या शहरी और क्या मैट्रो सिटी से संबंध रखने वाले लोग, सभी बाल विवाह की इस प्रथा को किसी न किसी स्तर पर पचाते हुए दिखते हैं। चाहे वह मनोरंजन के नाम पर हो या फिर उनके आसपास किसी मजबूरीवश होने वाले बाल विवाह। देश में कुछ हजार और लाख लोग ही लोग इस तरह के मामलों में सक्रीय होते दिख रहे हैं। यही बदलाव हमें चेंज डॉट आर्ग नाम बेवसाइट पर दिखता महसूस हो रहा है। लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि विश्व में होने वाले बाल विवाह में प्रत्येक तीसरी बाल बधु हमारे देश की होती हैं। यह हाल में हुए अध्ययन में दिखाया गया।
हाल ही जारी एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट एलिमिनेटिंग चाइल्ड मैरिज इन इंडिया: प्रोग्रेस एंड प्रॉस्पेक्ट्समें बताया गया है कि भारत में दुनिया की करीब 33 प्रतिशत बाल वधुएं हैं और करीब 10.3 करोड़ भारतीयों की शादी अठारह साल से पहले हो जाती हैरिपोर्ट में 2011 की जनगणना आंकड़ों को आधार बनाकर विश्लेषण करने के बाद कहा गया कि देश में हो रहे 10.3 करोड़ बाल विवाहों की संख्या फिलीपीन्स (10 करोड़) और जर्मनी (8 करोड़) की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। इन आंकड़ों के मूल्यांकन से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक विकसित देश की जनसंख्या से अधिक हमारे यहां बाल विवाह संपन्न करा दिए जाते हैँ। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सब सामाजिक सहमति से ही होते हैँ। हमारी सामाजिक सहमति को देखते हुए ही इस तरह के सीरियल अपनी लोकप्रियता की मिसाल कायम कर लेते हैं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। इसी तरह की बात भारत वार्षिक सेंसस 2011 भी कहता है कि 12 मिलियन लोगों की शादी उनकी 10 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले हो जाती है। दुर्भाग्य यह है कि इनमें से 65 प्रतिशत लड़कियां होती हैं।
अभी भी बाल विवाह का समर्थन करने वाले इस बात की ताकीद करते हैं कि बचपन में शादी करने से कुछ भी गलत नहीं होता है क्योंकि हम गौना (शादी के कुछ सालों बाद लड़की को ससुराल भेजने का रिवाज) बाद में करते हैं। इसलिए कम उम्र में शादी होने से होने वाले नुकसान, जो गिनाए जाते हैं, नहीं होते हैं। एक्शन एड इंडिया की रिपोर्ट की माने तो 18 साल से कम उम्र होने वाली 10.3 करोड़ भारतीयों में से करीब 8.52 करोड़ की संख्या लड़कियों की होती है। इसी तरह इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, आने वाली हमारी भावी पीढ़ी पर भी पड़ता है। उनकी आने वाली संतानें न केवल कुपोषण का शिकार होती हैं बल्कि वे अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर उठाने में नाकामयाब रहती हैं। शिशु एवं मातृ मुत्यु दर में इजाफा के मूल में बाल विवाह एक बड़ा कारण है। इसी रिपोर्ट की माने तो बालिकाओं के बाल विवाह रोकने से तकरीबन 27 हजार नवजातों, 55 हजार शिशुओं की मौत और 1,60,000 बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के लेखक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एसिस्टेंस प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास गोली कहते हैं कि बाल विवाह केवल मानवाधिकार और लिंग आधारित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनांनकीय के स्वास्थ, शिक्षा, और आर्थिक उन्नति के मामले के गंभीर परिणाम हैं। महिलाएं हमारी आधी आबादी हैं और यदि हम बाल विवाह से नहीं लड़ पा रहे हैं, तो यह हमारी आर्थिक व्यवस्था को अस्वस्थ और अकुशल मैन पॉवर उपलब्ध कराएगी जो हमारी आर्थिक ग्रोथ, जिसकी दोगुना करने की आशा व्यक्त की जाती है, इसे कम कर देगी।प्रश्न उठता है कि इतनी जागरुकता अभियान जो सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर चलाए जा रहे हैं, के बावजूद बाल विवाह रुक क्यों नहीं रहा है। इसके मूल में ऐसे कौन से कारण होते हैं, जो सभी तरह के नुकसान को देखते हुए भी मां-बाप बाल विवाह करने से नहीं चूकते हैं। देश में अधिकांश घरों में लड़कियों को बोझ माना जाता है और इस बोझ को उतारने की प्रक्रिया उनकी कम उम्र में शादी के रूप में देखी जाती है। इसमें गरीबी भी एक प्रमुख कारण होता है, जहां लड़की को उसके ससुराल भेजने की जल्दी दिखाई जाती है। समाज में दहेज का लेन-देन भी लड़की जल्दी शादी कर देने का कारण माना जा सकता है। जल्दी शादी करने से लड़के वाले दहेज ज्यादा नहीं मांगते हैं। हमारे समाज का ढांचा इस तरह का है कि लड़कियां दूसरे घर की धरोहर मानी जाती है। उन्हें घर तक सीमित रखते हुए जल्दी से जल्दी ससुराल भेजना मानकर चला जाता है, इसलिए लड़कियों की शादी कर दूसरे घर भेजने में ही इतिश्री समझी जाती है। कुछ समाजों में पितृसत्ता और सामंतवाद इतना हावी रहता है कि वे बेटियों और बहुओं को अपने अनुसार कंट्रोल करना चाहते हैं, इसलिए कम उम्र में ही उन्हें घर-गृहस्थी के चक्कर में डालकर मां-बाप एक चिंता से मुक्ति पा लेना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त समाज में लड़कियों के लिए असुरक्षा का भाव और माहोल भी उनकी जल्दी शादी के लिए मां-बाप को इस ओर प्रेरित करता है।
अब यह भी प्रश्न उठता है कि बाल विवाह जो इतने प्रयासों से थम नहीं रहा है, तो कैसे इसके हानिकारक प्रभावों को दूर किया जा सकता है। वास्तव में बच्चों का बचपन छीनकर उन्हें घर गृहस्थी के भार से लादने वाले माता-पिता गरीबी और अशिक्षा के दुष्चक्र में फंसे होते हैं। इसलिए लड़कियों के भार को दूसरे घर भेजने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। लड़कियों को भार न समझा जाए, इसके लिए बच्चियों के पैदा होने और बड़े होने के साथ होने वाली शिक्षा की व्यवस्था को सरकार को समझना चाहिए। ऐसी योजनाओं को बढावा भी देना चाहिए। एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट जारी करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अभिनेत्री शबाना आजमी की कही इस बात से समझा जा सकता है कि पितृसत्ता बाल विवाह की जड़ में है और बाल विवाह रोकने के लिए पितृसत्ता से पूरी तरह से निपटना होगा लड़कियों को शिक्षित करना और उनमें भरोसा पैदा करना होगा ताकि वे बाल विवाह का विरोध करें और अपने जीवन के बारे में खुद फैसला करें

बुधवार, 1 जून 2016

शादी सात जन्मों का बंधन है!

‘विवाह एक पवित्र संस्कार है।’ ‘षादी सात जन्मों का बंधन है।’ ‘जोड़ियां ऊपर से बन कर आती हैं।’ ‘पति-पत्नी का रिष्ता एक पवित्र बंधन है’...आदि, इत्यादि। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो हमारे अंदर सदियों से पैंबस्त की गई हैं। और समाज इसी बने बनाएं मूल्यों पर चल रहा है। जब कोई बात इस मूल्य रूपी ढांचे को तोड़ता नजर आता है तो हम बड़े आराम से षुर्तुगमुर्गी रवैया अख्तियार कर लेते हैं और तत्काल उस समस्या या बुराई से ही इंकार कर देते हैं। यह हमारे समाज के दोहरे रवैये को दर्षाता है। जोकि हमारे लिए कहीं अधिक घातक है।
ऐसा ही कुछ रवैया हम ‘मैरिटल रेप’ या वैवाहिक बलात्कार को लेकर दिखा रहे हैं। संयुक्त राश्ट्र की संस्था यूनीसेफ कहती है कि भारत में 15-19 साल की उम्रवाली 34 फीसदी विवाहित लड़कियां को अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलनी पड़ती है। 77 फीसदी पत्नियां कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा जबरदस्ती यौन संबंध बनाने को मजबूर की जाती हैं। इसलिए यूनीसेफ ने सलाह दी थी कि भारत में मैरिटल रेप को क्रिमिनल आफेंस में षामिल कर लेना चाहिए। लेकिन दो साल पहले दी गई इस सलाह को हमारे यहां दूसरी तरह की बहस का मुद्दा बना दिया गया। यहां तक कहा जा रहा है कि इस तरह का कोई भी कानून हमारी वैवाहिक संस्था के लिए घातक होगा और फलस्वरूप सदियों से चली आ रही पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। जो कि बहुत ही अतिपूर्ण नजरिया है।

हमारे समाज मे सेक्स इतना टैबू है कि इसको लेकर कोई बात नहीं जा सकती है चाहे वह एक सामाजिक बुराई का ही रूप क्यों न ले लें। अगर हम इस बात को ही मानने के लिए तैयार नहीं है कि बलात्कार की ज्यादातर घटनाएं घर की चाहरदीवारी में होती है और रेप की इन घटनाओं में से 09-15 फीसदी वैवाहिक बलात्कार के मामले होते हैं। तो आगे की चीजों को हम किस प्रकार तबज्जो देगें? हाल ही में इस मामले में इंदिरा जयसिंह द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट में मैरिटल रेप के अपराधीकरण की सिफारिश की है। इतना ही नहीं निर्भया केस के बाद बनी जस्टिस वर्मा आयोग द्वारा मैरिटल रेप को अपराधों की श्रेणी में शामिल किए जाने की सिफारिश की जा चुकी है। बावजूद इसके हम या हमारी सरकार इस मामले को ‘पवित्र बंधन’ से अधिक मानने को तैयार नहीं दिख रही है। जबकि अमेरिका में 1993 में ही मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में षामिल कर लिया गया था।
मैरिटल रेप को अपराध न समझने को लेकर इतना ऊहापोह सरकार क्यों दिखा रही है। एक महिला के साथ जब रेप होता है तो उसका प्रभाव उम्र भर उस महिला के साथ रहता हैं। वह जिंदगी भर उस हादसे को नहीं भूल सकती। फिर घर के अंदर बेडरूम में वह यह सब झेलती है तो उसका असर उस पर इतना कम करके क्यों आका जा रहा है? केवल इसलिए कि वह अपराध कोई और नहीं बल्कि उसका पति परमेष्वर कर रहा है? यह और कुछ नहीं बल्कि हमारी स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता को ही दिखाता है। यह सब उसी समाज में सही ठहराया जा सकता है जहां स्त्रियों को दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता है। स्त्रियों के प्रति अगर हमारी संवेदनषीलता जरा भी है तो इस मुद्दे पर सोचने के लिए हम मजबूर हो जाएंगे।
मैरिटल रेप मुद्दे पर जब पुरुशों की राय ली जाती है तो उनका वही घिसा-पिटा जवाब होता है कि ऐसे तो हर घर का पति जेल में ही होगा या फिर कानून का मिस-यूज खूब किया जाएगा। कुछ पतियों का यह भी मानना है कि षादी की ही किसलिए जाती है? कहने का अर्थ है कि पति रूपी पुरुष यह बात मानने के लिए कतई तैयार ही नहीं है कि षादी जैसी  पवित्र संस्था में ‘रेप’ जैसा भी कुछ होता है। यह बिलकुल वैसा ही है जब घरेलू हिंसा को लेकर कानून बनाया गया था तब भी लोगों के तर्क इसी तरह के थे कि यह कानून परिवार को तोड़ने का काम करेगा। भला पति यदि अपनी पत्नी को मारता-पीटता या बदजुबानी करता है तो इसमें किसी बाहरी व्यक्ति को क्यूं हस्ताक्षेप करना चाहिए? यह हमारा अपना घरेलू मामला है। पर अंततः जब सरकार ने अपनी संवेदनषीलता दिखाई और घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 बनाया तब हकीकत सबके सामने आ पाई।
कुछ समय में ही मैरिटल रेप एक बहस का मुद्दा बन गया है और बड़े रूढ़िवादी इसके अपराधीकरण किये जाने को विवाह संस्था के लिए खतरा बता रहे है। साथ ही साथ लॉ कमीशन भी इस मामले में अल्पज्ञता दिखा रहा है। विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट ने ‘वैवाहिक रिश्ते के साथ अत्यधिक हस्तक्षेप’ बताकर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इन सबके बीच यह प्रष्न उठता है कि षादी नामक संस्था का भार क्या सिर्फ नारी को ही उठाना पड़ता है? यदि वह अपने बारे में एक प्राणी मात्र होने के कारण सोचती है तो उसे अपराध बोध का भय क्यों लगा रहता है? जिसके कारण उसे मानसिक और षारीरिक रूप से इतना संघर्ष करना पड़ता है जिसका परिणाम अंततः उसे अपनी जिंदगी दे कर चुकाना पड़ जाता है। इससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में भी ‘शादी की पवित्रता’ और गरीबी, अषिक्षा के नाम पर पतियों द्वारा किया जाने वाला बलात्कार परिवार संस्था को बनाए रखने के लिए ‘वैध’ ही बना रहेगा!

( 'मेरी सजनी' के जून अंक में प्रकाशित )